अमरीकी करार का संभावित असर
14-Feb-2026 11:28 AM
भारत और अमरीका के बीच जो अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौता हुआ है वह दोनों देशों के लिए लाभदायक माना जा रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि अगर भारत को इससे फायदा होगा तो नुकसान की आशंका भी लगी रहेगी। भारतीय कृषि क्षेत्र काफी संवेदनशील है और इस पर पड़ने वाला छोटा सा भी प्रतिकूल असर बाद में नासूर बन सकता है।
नब्बे के दशक में जब मुक्त बाजार व्यवस्था लागू करते हुए खाद्य तेलों के आयात को बंधन मुक्त किया गया था तब इसे मामूली घटना माना जा रहा था लेकिन बाद में इसका कितना भयावह परिणाम सामने आया- यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। आज भारत दुनिया में खाद्य तेलों का सबसे बड़ा आयातक देश बना हुआ है जहां प्रति वर्ष 160-165 लाख टन का आयात हो रहा है और इस पर अरबों डॉलर खर्च हो रहे हैं। यही स्थिति दलहनों की भी है।
इसका आयात भी 2024-25 के दौरान उछलकर 73 लाख टन के सर्वकालीन सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया। अब सरकार खाद्य तेलों एवं दलहनों के रिकॉर्ड आयात से विचलित है और इस पर अंकुश लगाना चाहती है मगर मामला इतना आगे बढ़ चुका है कि आयात को नियंत्रित करना असंभव नहीं तो अत्यन्त कठिन अवश्य हो गया है। सरकार की किसी भी योजना का कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आ रहा है।
यूरोपीय संघ के साथ हुए द्विपक्षीय व्यापारिक करार पर कोई हंगामा नहीं हुआ क्योंकि उसके प्रावधानों से कृषि क्षेत्र को बाहर रखा गया। लेकिन अमरीका के साथ जो करार हुआ है उसमें अनेक कृषि उत्पाद शामिल हैं।
यह सही है कि भारत ने चावल, गेहूं, डेयरी उत्पाद, पॉल्ट्री उत्पाद तथा जीएम श्रेणी के मक्का एवं सोयाबीन के मामले में अमरीका को कोई राहत-रियायत देने से इंकार कर दिया लेकिन अमरीका अन्य उत्पादों पर अपनी शर्त मनमाने में सफल हो गया। उसे भारत में सोयाबीन तेल, ज्वार, डीडीजीएस, ताजे एवं प्रसंस्कृत फल तथा सूखे मेवे आदि के निर्यात की अनुमति मिल गई।
अमरीका ने भारतीय उत्पादों पर आयात शुल्क को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया जबकि भारत ने अमरीका के कई उत्पादों को सीमा शुल्क से ही मुक्त कर दिया। अब यह सवाल पूछा जा रहा है कि 18 प्रतिशत ज्यादा होता है या शून्य प्रतिशत। मामला काफी पेचीदा है लेकिन करार के प्रभाव एवं परिणाम को जानने-समझने के लिए इंतजार करना पड़ेगा।
