खाद्य तेलों के आयात को नियंत्रित करने की सख्त आवश्यकता

28-Oct-2025 06:14 PM

मुम्बई। भारत में विदेशी खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता बढ़कर 55 से 65 प्रतिशत के बीच पहुंच गई है जिससे घरेलू प्रभाग में तिलहनों एवं  खाद्य तेलों के उत्पादन संवर्धन को समुचित प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है और आपूर्ति श्रृंखला में अनिश्चितता की कमी रहती है। खाद्य तेलों का घरेलू बाजार भाव काफी हद तक अंतर्राष्ट्रीय बाजार मूल्य पर आश्रित हो गया है। 

हाल के एक अध्ययन रिपोर्ट में खाद्य तेलों की आपूर्ति एवं उपलब्धता की स्थिति को सुगम एवं व्यवस्थित बनाने के लिए कुछ अच्छे उत्पादों की सिफारिश की गई है। इसमें एक निश्चित सीमा शुल्क प्रबंधन, बाजार के आंकड़ों के सिस्टम की एक सशक्तिकरण तथा नीति परिवर्तन से पूर्व सभी सम्बद्ध से सलाह- मशविरा करना भी शामिल है। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत संसार में खाद्य तेलों का सबसे प्रमुख आयातक देश बना हुआ है। यह एक नकारात्मक उपलब्धि है और खाद्य तेल के आयात पर प्रति वर्ष अत्यन्त विशाल धनराशि खर्च हो रहे है जिससे अर्थ व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ रहा है। इस स्थिति को यथाशीघ्र बढ़ते जाने की जरूरत है।

खाद्य तेलों पर आयात शुल्क का ढांचा दशकों पुराना है जिसे अब सामयिक एवं व्यावहारिक स्वरुप दिया जाना चाहिए। इसके तहत जब वैश्विक बाजार भाव ऊंचा हो तब आयात शुल्क को घटाया जाना चाहिए और जब नीचे हो तब शुल्क की दर को बढ़ाया जाना चाहिए।

लेकिन शुल्क परिवर्तन के क्रम में यह तथ्य हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए कि विदेशों से आयातित खाद्य तेल का भाव स्वदेशी खाद्य के दाम से ऊंचा या बराबर रहे।

इससे घरेलू क्रशिंग- प्रोसेसिंग उद्योग को अपने खाद्य तेल की बिक्री में कोई परेशानी नहीं होगी और वह किसानों से ऊंचे दाम पर तिलहन खरीदने के लिए प्रोत्साहित होगा।

किसानों को भी तिलहनों का उत्पादन बढ़ाने का प्रोत्साहन मिलेगा। वर्ष 2015 से अब तक खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में 25 बार परिवर्तन हो चुका है। उद्योग व्यापार क्षेत्र को यह पता ही नहीं होता है कि आयात शुल्क में कब बढ़ोत्तरी होगी और कब कटौती की जाएगी।