मक्का का उत्पादन बढ़ाने के लिए सतत गंभीर प्रयास की जरूरत
20-Jul-2024 10:47 AM
नई दिल्ली। पिछले दो दशकों के दौरान भारत में मक्का का उत्पादन तीन गुना से भी ज्यादा बढ़ा है लेकिन इसकी मांग एवं खपत में भी इसी अनुपात में बढ़ोत्तरी होने से देश में अब इसका आभाव महसूस होने लगा है पहले मक्का के एक खाद्य उत्पाद एवं पशु आहार के लिए कच्चा माल माना जाता था जबकि अब यह एक ईंधन उत्पाद के तौर पर भी इस्तेमाल होने लगा है एथनॉल निर्माण में जिस गति से मक्का का उपयोग बढ़ रहा है उसे देखते हुए इसके घरेलू उत्पादन में अनवरत भारी बढ़ोत्तरी करने की जरूरत पड़ेगी अन्यथा दलहनों एवं खाद्य तेलों की भांति विदेशो से इसके आयात पर निर्भरता बढ़ने में देर नहीं लगेगी। मक्का मोटे अनाजों के संवर्ग का सबसे महत्वपूर्ण उत्पाद है।
हरित क्रांति की सफलता से भारत चावल तथा गेहूं के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गया और शुरुवाती दौर में घरेलू खपत कम होने से मक्का के आयात की आवश्यकता भी महसूस नहीं हो रही थी मगर अब हालत बदल गए है। वर्ष 1999-2000 की दौरान भारत में 115 लाख टन मक्का का उत्पादन हुआ था जो 2023-24 तक आते-आते तीन गुना से अधिक बढ़कर 350 लाख टन से ऊपर पहुंच गया। इस अवधि में बिजाई क्षेत्र के साथ -साथ मक्का की औसत उपज दर भी 1.80 टन प्रति हेक्टेयर से उछलकर 3.30 टन प्रति हेक्टेयर हो गई।
देश में उत्पादित मक्का की कुल मात्रा में से करीब 20 प्रतिशत मक्का का उपयोग पॉल्ट्री एवं पशुआहार निर्माण उद्देश्य में किया जाता है। मक्का मे कार्बोहाइड्रेट प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है जो पशु-पक्षियों के लिए ऊर्जा का श्रोत है। अब स्टार्च एवं एथनॉल निर्माण में मक्का का उपयोग तेजी से बढ़ने के कारण न केवल इसका भाव तेज होता जा रहा है बल्कि पॉल्ट्री उद्योग के लिए इसकी आपूर्ति एवं उपलब्धता भी घट रही है इस कमी को पूरा करने के लिए उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है।
