दक्षिण भारतीय कॉटन यार्न बाजार में मिश्रित मांग से कीमतों में स्थिरता

23-Jul-2025 03:11 PM

कोयम्बटूर। अन्य राज्यों की भांति दक्षिण भारत में भी कपास की बिजाई सामान्य ढंग से हो रही है और इसके समर्थन मूल्य में 589 रुपए प्रति क्विंटल का भारी इजाफा होने से किसान इसकी खेती में दिलचस्पी भी दिखा रहे हैं। वैसे राष्ट्रीय स्तर पर इसका क्षेत्रफल कुछ पीछे चल रहा है। दक्षिण भारत में कपास का उत्पादन तेलंगाना, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश में बड़े पैमाने पर होता है जबकि तमिलनाडु में भी इसकी पैदावार होती है।

दिलचस्प तथ्य यह है कि सीमित उत्पादन के बावजूद तमिलनाडु में कॉटन उद्योग काफी विकसित अवस्था में है क्योंकि वहां अन्य प्रमुख उत्पादक राज्यों और खासकर गुजरात- महाराष्ट्र से इसे बड़े पैमाने पर मंगाया जाता है। तेलंगाना दक्षिण भारत का सबसे बड़ा तथा भारत में तीसरा सबसे प्रमुख कपास उत्पादक राज्य है। वहां बिजाई कुछ पिछड़ने के संकेत मिल रहे हैं। 

दक्षिण भारत के प्रमुख कॉटन यार्न मार्केट में मिश्रित मांग के साथ कीमतों में काफी हद तक स्थिरता देखी जा रही है। भारत और अमरीका के बीच द्विपक्षीय व्यापार वार्ता एवं करार में अनिश्चितता को देखते हुए तिरुपुर मार्केट में कारोबारी गतिविधियां कमजोर पड़ गई हैं

और कपास का भाव ऊंचा होने के बावजूद जिनिंग-स्पिनिंग इकाइयों को अपने कॉटन यार्न का दाम बढ़ाने की हिम्मत नहीं हो रही है। उन्हें आशंका है कि कीमत बढ़ने से मांग और भी कमजोर पड़ सकती है। 

इधर महाराष्ट्र के मुम्बई मार्केट में कॉटन यार्न की मांग पहले स्थिर थी मगर अब धीरे-धीरे इसमें सुधार हैं। हैंडलूम फिलहाल कुछ अधिक क्षमता के साथ कार्यरत है मगर कॉटन यार्न की कीमतों में तेजी नहीं देखी जा रही है। टेक्सटाइल उद्योग की वित्तीय स्थिति कमजोर है।

कपास के ऊंचे दाम के कारण कॉटन उत्पादों का लागत खर्च बढ़ गया है और अंतर्राष्ट्रीय निर्यात बाजार में इसकी प्रतिस्पर्धी क्षमता घट गई है। इससे उद्योग एवं निर्यातकों को बहुत कम मार्जिन पर अपना कारोबार करने के लिए विवश होना पड़ रहा है। उधर गुजरात में रूई का भाव मजबूत होने लगा है। 

केन्द्रीय कपड़ा मंत्रालय की अधीनस्थ एजेंसी- भारतीय कपास निगम (सीसीआई) के पास रूई का अच्छा खासा स्टॉक मौजूद है और मिलर्स द्वारा नियमित रूप से इसकी खरीद भी की जा रही है।