दलहन-तिलहन फसलों की पैदावार बढ़ाने हेतु सरकार को गंभीर प्रयास करने की जरूरत

06-Nov-2024 03:26 PM

नई दिल्ली। सामान्य धारणा यह है कि भारत में दलहन-तिलहन फसलों के उत्पादन में अपेक्षित बढ़ोत्तरी करने के लिए धान, गेहूं एवं मक्का की खेती पर किसानो की निर्भरता घटना जरूरी है धान की फसल को सबसे ज्यादा पानी की जरूरत पड़ती है जबकि पंजाब, हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भूमिगत जल का स्तर घटता जा रहा है।

सरकार फसल विविधीकरण पर जोर दे रही है जिसके तहत खासकर दलहन तिलहन का उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है मगर अन्य फसलों का उत्पादन घटाकर इसकी पैदावार बढ़ाना व्यवहारिक कदम नहीं होगा। 

बेशक भारत फ़िलहाल चावल, गेहूं मक्का के उत्पादन से आत्मनिर्भर बना हुआ है लेकिन जब भी किसी कारणवश उत्पादन में गिरावट आती है तब इसका बाजार भाव उछल जाता है जिससे आम लोगो की परेशानी बढ़ जाती है यह सही है कि दलहनों एवं खाद्य तेलों का उत्पादन कम होने से विदेशो से इसके विशाल आयात की आवश्यकता पड़ती है

जिस पर भारी भरकम बहुमूल्य विदेशी मुद्रा खर्च होती है लेकिन इस पर अंकुश लगाने के लिए वैकल्पिक प्रयास किए जाने की जरूरत है।

भारत अभी दुनिया में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक देश बना हुआ है और इसके शिपमेंट से देश को अरबो डॉलर की आमदनी प्राप्त होती है यदि इसका उत्पादन घटाने का प्रयास किया गया तो निर्यात आय स्वाभाविक रूप से प्रभावित होगी। 

मक्का की मांग एवं खपत तेजी से बढ़ती जा रही है जबकि आगे भी इसमें वृद्धि का सिलसिला जारी रहने की संभावना है क्योंकि एथनॉल निर्माण में इसकी विशाल मात्रा का उपयोग होगा।

इसे पूरा करने से घरेलू उत्पादन असमर्थ साबित हो सकता है और विदेशो से इसके भारी आयात की आवश्यकता पड़ सकती है। 

जहां तक गेहूं का सवाल है तो इसका घरेलू उत्पादन एवं उपयोग लगभग संतुलित स्तर पर है जबकि बाजार भाव सरकारी समर्थन मूल्य से काफी ऊंचा चल रहा है गेहूं का घरेलू उत्पादन बढ़ाये जाने की आवश्यकता महसूस हो रही है 

दलहन-तिलहन फसलों के साथ समस्या यह है कि इसकी औसत उपज दर काफी नीचे रहती है जिसे ऊपर उठाने की आवश्यकता है

इसी तरह खाली पड़े या परती खेतो में इसकी खेती पर जोर दिया जा सकता है। धान की कटाई होने के बाद जहां खेत खाली होते है वहां दलहन-तिलहन फसलों की खेती की जा सकती है। इससे मिटटी की उर्वरा शक्ति भी बढ़ेगी।