उड़द का उत्पादन क्षेत्र गत वर्ष से कम रहने की संभावना

05-Aug-2025 04:56 PM

नई दिल्ली। प्रमुख उत्पादक इलाकों में भारी वर्षा एवं खेतों में जल जमाव से उड़द की बिजाई प्रभावित हो रही है जबकि किसानों द्वारा मक्का जैसे अन्य वैकल्पिक कृषि उत्पादों की खेती पर ज्यादा जोर दिए जाने से भी इसका रकबा घट रहा है।

केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार चालू खरीफ सीजन के दौरान इस महत्वपूर्ण दलहन फसल का घरेलू उत्पादन क्षेत्र घटकर 18.60 लाख हेक्टेयर पर अटक गया जो गत वर्ष की समान अवधि के बिजाई क्षेत्र 19.10 लाख हेक्टेयर से 50 हजार हेक्टेयर तथा सामान्य औसत क्षेत्रफल 32.60 लाख हेक्टेयर से 14 लाख हेक्टेयर पीछे है। चूंकि बिजाई का आदर्श समय अब लगभग खत्म होने वाला है इसलिए उड़द के रकबे में ज्यादा सुधार आना मुश्किल लगता है।     

उपलब्ध जानकारी के अनुसार उड़द का उत्पादन क्षेत्र गुजरात में 77 हजार हेक्टेयर से घटकर 59 हजार हेक्टेयर रह गया है मगर राजस्थान में 2.97 लाख हेक्टेयर से सुधरकर 3.12 लाख हेक्टयेर पर पहुंच गया है।

उड़द का रकबा महाराष्ट्र में 10 प्रतिशत एवं तेलंगाना में 11 प्रतिशत पीछे चल रहा था। आंध्र प्रदेश में बिजाई 11 प्रतिशत बढ़ने की सूचना मिल रही है। 

एक अग्रणी व्यापारिक संस्था- इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन के सचिव का कहना है कि उड़द की बिजाई का समय समाप्त होने वाला है इसलिए क्षेत्रफल में ज्यादा इजाफा नहीं हो पाएगा।

राजस्थान, मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में नियमित रूप से मूसलाधार बारिश हो रही है। जिससे न केवल उड़द की बिजाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है बल्कि कुछ क्षेत्रों में पहले बोई गई फसल को नुकसान होने की आशंका भी बढ़ गई है। 

एक व्यापारी के मुताबिक मध्य प्रदेश में अशोक नगर, गुना,  शिवपुरी बेल्ट में भारी वर्षा से उड़द की  फसल काफी हद तक क्षतिग्रस्त हो गई है। खेतों में या तो पानी भरा है या नमी का ज्यादा अंश मौजूद है  इसलिए वहां दोबारा बिजाई भी संभव नहीं हो पायेगी।

इस बार दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा काफी हद तक देश के मध्यवर्ती, पश्चिमोत्तर एवं उत्तरी क्षेत्र तक सीमित रही। मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश के प्रमुख उड़द उत्पादक जिलों में सामान्य औसत से काफी अधिक बारिश हुई। उड़द की फसल काफी संवेदनशील होती है और जलवायु में हल्का परिवर्तन भी इसे नुकसान पहुंचा सकता है। 

आई ग्रेन इंडिया के डायरेक्टर का कहना है कि बिजाई की वास्तविक तस्वीर सामने आना अभी बाकी है। कुछ उत्पादक राज्य बिजाई का आंकड़ा देर से जारी करते हैं इसलिए स्थिति स्पष्ट होने में करीब 15 दिन का समय लग सकता है। लेकिन ऐसा लगता है कि क्षेत्रफल में इस बार काफी गिरावट आ सकती है।