अधिशेष उत्पादन एवं कम निकासी से चीनी उद्योग की बढ़ेगी मुसीबत

22-Dec-2025 01:14 PM

मुम्बई। स्वदेशी चीनी मिलों को अब उसकी अधिकता के संकट का सामना करना पड़ सकता है। जिससे उसे 2010 के दशक के दौरान जूझना पड़ा था। चालू सीजन के दौरान चीनी का उत्पादन घरेलू मांग एवं जरूरत से ज्यादा होने की उम्मीद है जिससे उसके पास बकाया स्टॉक ऊंचा रहेगा और मुद्रा प्रवाह की गति अवरुद्ध हो जाएगी।

केन्द्र सरकार ने 15 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी है जबकि उद्योग कम से कम 20 लाख टन के निर्यात कोटे की मांग कर रहा था। इसके अलावा एथनॉल की आपूर्ति का जो कोटा नियत किया गया है वह भी पर्याप्त नहीं है क्योंकि इस एथनॉल के निर्माण के लिए महज 34-35 लाख टन चीनी के समतुल्य गन्ना अवयवों की आवश्यकता पड़ेगी। उद्योग को इस बार एथनॉल उत्पादन में 42-45 लाख टन चीनी के इस्तेमाल होने की उम्मीद थी। 

खाद्य एवं औद्योगिक उद्देश्य के लिए चीनी की घरेलू मांग एवं खपत में ज्यादा बढ़ोत्तरी होने की उम्मीद नहीं है। 2025-26 के मौजूदा मार्केटिंग सीजन में चीनी की सकल घरेलू मांग 285-290 लाख टन के बीच होने का अनुमान लगाया जा रहा है जो 2024-25 सीजन के लगभग बराबर है।

ऐसी हालत में उद्योग के पास अनबिकी चीनी का विशाल स्टॉक मौजूद रहने पर उसकी मुद्रा-प्रवाह की गति सुस्त हो जाएगी और सही समय पर गन्ना किसानों के बकाए का भुगतान करने में भारी कठिनाई हो सकती है।

चीनी उत्पादन के लिए उद्योग को इस बार विशाल मात्रा में गन्ना खरीदना पड़ेगा क्योंकि इसकी अच्छी पैदावार होने के संकेत मिल रहे हैं। केन्द्र सरकार द्वारा उचित एवं लाभकारी मूल्य' (एमआरपी) बढ़ाए जाने से गन्ना महंगा हो गया है।

उसके फलस्वरूप चीनी मिलों को ऊंची कीमत का भुगतान करना पड़ेगा जबकि उत्पादित स्टॉक की समुचित बिक्री (निकासी) नहीं होने से मिलर्स को धन की तंगी का सामना करना पड़ सकता है।

सीमित घरेलू मांग एवं अधिशेष उत्पादन के कारण चीनी के एक्स फैक्टरी बिक्री मूल्य में भी गिरावट आ गई है और यह घटकर लागत खर्च से काफी नीचे आ गया है।

इससे अब चीनी का उत्पादन करना आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद नहीं माना गया है। इससे अब चीनी का उत्पादन करना आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद नहीं माना जा रहा है। सरकार को चीनी उद्योग की तमाम समस्याओं के निराकरण के लिए तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए।