भारत के मैदान में उतरने से थाईलैंड में चावल निर्यातकों की कठिनाई बढ़ने की सम्भावना
04-Oct-2024 03:36 PM
बैंकॉक। थाईलैंड को चावल के वैश्विक निर्यात बाजार में पहले से ही वियतनाम, पाकिस्तान, म्यांमार एवं कम्बोडिया जैसे देशों की कठिन चुनौती एवं सख्त प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा था जबकि अब भारत के भी बाजार में उतरने से उसकी कठिनाई और बढ़ जाएगी। हाल ही में भारत सरकार ने गैर बासमती सफ़ेद चावल के निर्यात को नियंत्रांत युक्त कर दिया है और सेला चावल पर निर्यात शुल्क को 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत नियत कर दिया है। इसके फलस्वरूप आगामी महीनों में भारत से सामान्य श्रेणी के चावल का निर्यात तेजी से बढ़ने की सम्भावना है जिसका असर अन्य निर्यातक देशों पर पड़ना स्वाभाविक ही है। भारतीय चावल अन्य देशों से कम दाम पर उपलब्ध रहता है।
वियतनाम, पाकिस्तान, म्यांमार एवं कम्बोडिया जैसे देशों में उत्पादन खर्च नीचे रहता है। फसल की उपज दर ऊंची रहती है और मुद्रा भी कमजोर होती है जिससे चावल के निर्यात बाजार में इन देशों को अतिरिक्त फायदा मिल जाता है। दूसरी ओर थाईलैंड की मुद्रा-बहत अक्सर अमरीकी डॉलर की तुलना में मजबूत रहती है जिससे विदेशी आयातकों को वहां से चावल मंगाना महंगा पड़ता है। अब भारत एक गंभीर चुनौती के रूप में उसके सामने आ गया है।
थाई राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष ने कहा है कि वैश्विक निर्यात बाजार में भारत की वापसी होने तथा अमरीकी डॉलर के सापेक्ष 'बहत' भी विनिमय दर 30 माह के शीर्ष स्तर पर (1 डॉलर = 32.37 बहत) पहुंचने से थाई चावल की प्रतिस्पर्धी क्षमता घट गयी है।
थाईलैंड में 5 प्रतिशत टूटे सफ़ेद चावल का थोक बाजार मूल्य चालू वर्ष के आरम्भ में 2200 बहत प्रति क्विंटल चल रहा था जो अब घटकर 1600-1650 बहत प्रति क्विंटल पर आ गया है। इसके फलस्वरूप वहां धान की कीमत भी प्रभावित हुई है। जब भारतीय चावल (सफ़ेद) के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगा हुआ था तब थाईलैंड में 25 प्रतिशत नमी के अंश वाले धान का भाव 1000 बहत प्रति क्विंटल चल रहा था मगर अब यह घटकर 800-900 बहत प्रति क्विंटल रह गया है। वहां चावल का दाम आगे और भी घटने की सम्भावना है क्योंकि निर्यातकों को अन्य देशों की प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए चावल के निर्यात ऑफर मूल्य में कटौती करना आवश्यक होगा।
