गेहूं के निर्यात पर सरकारी निर्णय से बाजार में मजबूती की धारणा
14-Feb-2026 12:22 PM
नई दिल्ली। केन्द्र सरकार ने 25 लाख टन साबुत गेहूं के व्यापारिक निर्यात की अनुमति प्रदान कर दी है और गेहूं उत्पादों का निर्यात कोटा भी 5 लाख टन से बढ़ाकर 10 लाख टन निर्यात करने का निर्णय लिया है। इससे घरेलू बाजार में कीमतों पर सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद है। मामूल हो कि सरकार गेहूं पर लगे भंडारण सीमा के आदेश को पहले ही वापस ले चुकी है। इससे व्यापारियों / स्टॉकिस्टों पर दबाव कम हो गया है।
अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भरपूर आपूर्ति एवं उपलब्धता के कारण गेहूं का भाव नरम चल रहा है जिससे भारतीय व्यापारियों को इसके निर्यात में थोड़ी कठिनाई हो सकती है। लेकिन भारत के लिए एक प्लस प्वाइंट यह है कि इसके सभी निकटवर्ती देशों- बांग्ला देश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालद्वीप एवं अफगानिस्तान और म्यांमार आदि में फिलहाल अन्य आपूर्तिकर्त्ता देशों से गेहूं मंगाया जा रहा है जो महंगा पड़ता है। ये देश अब भारतीय गेहूं की खरीद में दिलचस्पी दिखा सकते हैं। भारत से खाड़ी क्षेत्र के देशों में भी गेहूं का थोड़ा बहुत निर्यात संभव हो सकता है। गेहूं उत्पादों के निर्यात में भी लगभग यही स्थिति रहेगी।
केन्द्रीय पूल में 1 अप्रैल 2026 को करीब 182 लाख टन गेहूं का अधिशेष स्टॉक मौजूद रहने की संभावना है जबकि उसी समय नए गेहूं की सरकारी खरीद भी आरंभ हो जाएगी। गेहूं निर्यात की अनुमति देकर और स्टॉक लिमिट को हटाकर सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि स्टॉकिस्टों एवं बड़े-बड़े उत्पादकों के पास मौजूद स्टॉक की जल्दी-जल्दी निकासी हो जाए, मिलर्स-प्रोसेसर्स की गेहूं खरीद की गति तेज हो सके और घरेलू बाजार मूल्य में कुछ तेजी आ सके ताकि सरकार को भी अपने गेहूं की बिक्री बढ़ाने में सहायता मिल सके।
गेहूं का अगला उत्पादन एक बार फिर शानदार होने के आसार हैं। सरकार ने देखा कि 2025 के रबी मार्केटिंग सीजन में प्राइवेट फर्मों द्वारा भारी मात्रा में गेहूं की खरीद किए जाने से इसका थोक मंडी भाव काफी हद तक एक निश्चित सीमा में स्थिर रहा। यह नीति 2026 में भी अपनाई जा सकती है।
हालांकि गेहूं के निर्यात की स्वीकृति काफी देर से दी गई है लेकिन फिर भी घरेलू बाजार पर इसका सकारात्मक मनोवैज्ञानिक असर पड़ने की उम्मीद है। स्टॉकिस्टों का स्टॉक खाली होगा तो उसे अगले माल की खरीद का प्रोत्साहन मिलेगा।
