जून में मानसून की बारिश सामान्य औसत से अधिक होने का अनुमान
28-May-2025 10:54 AM
नई दिल्ली। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने जून से सितम्बर के चार महीनों की अवधि में सक्रिय रहने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून के सीजन में राष्ट्रीय स्तर पर दीर्घकालीन औसत के सापेक्ष अप्रैल में 105 प्रतिशत बारिश होने का अनुमान लगाया था जिसे अब बढ़ाकर 106 प्रतिशत नियत कर दिया है।
इसी तरह आईएमडी ने जून 2025 में सामान्य औसत के मुकाबले 108 प्रतिशत वर्षा होने की संभावना व्यक्त की है जिससे खरीफ फसलों की बिजाई करने में किसानों को अच्छी सहायता मिलेगी।
उल्लेखनीय है कि यदि इन चार महीनों की अवधि में कुल संचयी वर्षा 105 से 110 प्रतिशत के बीच होती है तो उसे सामान्य औसत से ऊंचा माना जाता है। इस बार मानसून नियत समय से 8 दिन पहले आना है और इसकी गति संतोषजनक है।
मौसम विभाग के मुताबिक वर्तमान मानसून सीजन के दौरान केवल पूर्वोत्तर क्षेत्र एवं बिहार के कुछ भागो को छोड़कर देश के अन्य सभी इलाकों में वर्षा सामान्य या उससे अधिक होने की उम्मीद है। इस अवधि के दौरान अरुणाचल प्रदेश, आसाम तथा मेघालय में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है।
जून में सामान्य से अधिक बारिश होने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर उच्चतम तापमान सामान्य स्तर पर उससे नीचे रह सकता है जिससे देश के किसी भी भाग में गर्म हवा की तेज लहर (हीट वेव) या 'लू' का प्रकोप रहने की आशंका नहीं है। आमतौर पर जून में 165.4 मि०मी० की औसत वर्षा होती है।
वर्षा पर आश्रित प्रमुख कृषि क्षेत्रों (कोर जोन) में भी इस बार सामान्य औसत से ज्यादा बारिश होने का अनुमान लगाया गया है। वहां मूसलाधार वर्षा की संभावना 56 प्रतिशत व्यक्त की गई है।
देश के मध्यवर्ती एवं पश्चिमी भाग में प्रमुख वर्षा आश्रित इलाकों में इस बार मानसूनी बारिश की हालत बेहतर रहने की उम्मीद है जिससे खरीफ फसलों और खासकर दलहन तथा तिलहन का उत्पादन काफी बढ़ सकता है। इससे दलहनों एवं खाद्य तेलों का आयात घटाने में सहायता मिलेगी। इसके साथ-साथ मक्का की पैदावार भी शानदार होने की उम्मीद रहेगी।
लेकिन इस सुनहरे परिदृश्य के बीच वर्षा का समान वितरण होना आवश्यक है। अक्सर देश के कई भागों में अत्यन्त मूसलाधार बारिश होने से भयंकर बाढ़ का खतरा रहता है
जबकि कुछ अन्य इलाकों में बहुत कम वर्षा होने से सूखे का संकट पैदा हो जाता है। सूखाग्रस्त इलाकों में कृषि उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होता है जबकि बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों में भी फसलों को नुकसान होता है।
