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23-Oct-2026 11:48 AM
नई दिल्ली। दक्षिण-पश्चिम मानूसन के चार माह की अवधि के दौरान देश में दीर्घकालीन औसत (एलपीए) के मुकाबले 12.6 प्रतिशत कम वर्षा हुई और यदि 15 अक्टूबर तक का आंकड़ा जोड़ा जाए तो वर्षा की कमी बढ़कर 15 प्रतिशत पर पहुंच गई। मौसम विभाग के अनुसार 15 अक्टूबर को दक्षिण-पश्चिम मानसून समूचे भारत से प्रस्थान कर गया।
इस मानसून के जाने के बाद देश के अधिकांश भागों में बारिश लगभग बंद हो गई जबकि पिछैती बिजाई वाली खरीफ फसलों को वर्षा की आवश्यकता बनी हुई है। वर्षा के अभाव में रबी फसलों की बिजाई प्रभावित होने की आशंका है। इसके आरंभिक संकेत भी मिल रहे हैं। रबी फसलों की बिजाई की धीमी शुरुआत हुई है। गेहूं सहित कुछ अन्य फसलों की खेती अभी शुरू भी नहीं हुई है। जिस सरसों का थोक मंडी मूल्य रिकॉर्ड स्तर पर चल रहा है और जिसके क्षेत्रफल में जबरदस्त इजाफा होने की उम्मीद की जा रही है उसकी बिजाई भी गत वर्ष से काफी पीछे चल रही है।
खरीफ कालीन फसलें मानसूनी बारिश पर काफी हद तक आश्रित रहती है इसलिए वर्षा में कमी का इस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है। मानसून सीजन के दौरान वर्षा का वितरण असमान रहा जिससे कई इलाकों में फसलों की प्रगति में भारी बाधा पड़ी और वहां औसत उपज दर तथा कुल पैदावार में भारी गिरावट आने की आशंका है।
एक उद्योग संगठन के अनुसार इस वर्ष खरीफ सीजन के दौरान देश में कम से कम 7 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की फसल इतनी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई कि उसकी कटाई-तैयारी नहीं हो पाएगी। इसी तरह महाराष्ट्र-कर्नाटक में सूखे की वजह से तुवर की फसल चौपट होती जा रही है। अब दक्षिण भारत एवं पूर्वी राज्यों में बारिश होने की संभावना है मगर खरीफ फसलों के लिए काफी देर हो चुकी है।