पिछले दो दशकों में काजू की प्रोसेसिंग एवं खपत में दोगुनी बढ़ोत्तरी

17-Nov-2025 04:36 PM

मंगलोर। घरेलू प्रभाग में तेजी से बढ़ती मांग एवं खपत को देखते हुए भारत में वर्ष 2045 तक काजू के प्रसंस्करण एवं उपयोग में वर्तमान स्तर के मुकाबले दोगुना इजाफा होने की संभावना है।

कर्नाटक के मंगलोर में काजू प्रसंस्करण के शताब्दी समारोह में काजू प्रोसेसिंग के भविष्य विषय पर बोलते हुए ऑल इंडिया काजू एसोसिएशन (एआईसीए) के अध्यक्ष ने कहा कि वर्ष 2045 तक देश में काजू की खपत में दोगुनी से अधिक की वृद्धि होने की उम्मीद है

और इसे पूरा करने के लिए उत्पादन में जोरदार इजाफा करने की जरूरत पड़ेगी। वर्तमान समय में देश के अंदर लगभग 20 लाख टन काजू की प्रोसेसिंग की आवश्यकता पड़ रही है जबकि अगले 20 वर्षों (दो दशकों) में इसकी जरूरत उछलकर कम से कम 40 लाख टन पर पहुंच जाएगी। 

एआईसीए के अध्यक्ष के अनुसार वैश्विक स्तर पर वर्तमान समय में लगभग 60 लाख टन कच्चे काजू का वार्षिक उत्पादन हो रहा है जबकि अगले 20 साल में यह ढाई गुणा से ज्यादा बढ़कर 150 लाख टन की सीमा को पार कर सकता है।

अफ्रीका, भारत, वियतनाम तथा अन्य क्षेत्रों में प्रोसेसिंग के लिए कच्चे काजू का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध रहेगा। उनका कहना था कि काजू की खपत में निरंतरता बनी रहेगी और कोई अन्य उत्पाद (सूखा मेवा) इसे प्रभावित करने की स्थिति में नहीं होगा।

काजू के उपयोग का दायरा बढ़ता जा रहा है और आगामी वर्षों के दौरान नए-नए क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल आरंभ हो सकता है।

काजू के उत्पादन एवं प्रसंस्करण में मशीनों के उपयोग पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रिंत किए जाने की आवश्यकता है। उपलब्धता के साथ आधुनिक मशीन- उपकरण से मुक्त इकाइयों का वर्चस्व बढ़ने के आसार हैं। 

एसोसिएशन के अध्यक्ष ने आशंका जताई कि आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) काजू प्रोसेसिंग को विस्थापित कर सकता है

लेकिन साथ ही साथ इससे उद्योग को अपनी दक्षता एवं कार्य कुशलता सुधारने में भी सहायता मिल सकती है। अफ्रीका महाद्वीप के पूर्वी एवं पश्चिमी देशों तथा कम्बोडिया आदि में कच्चे काजू का उत्पादन ज्यादा तेजी से बढ़ सकता है।