प्रतिकूल मौसम एवं प्राकृतिक आपदाओं से दलहन मिशन की बढ़ेगी चुनौती
24-Nov-2025 01:58 PM
नई दिल्ली। भारत सरकार ने 2030-31 के सीजन तक देश को दाल-दलहन के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से दलहनों में आत्मनिर्भरता मिशन की शुरुआत की है और इनके तहत अगले पांच वर्षों में दलहनों का घरेलू उत्पादन बढ़ाकर 350 लाख टन पर पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है जो रणनीतिक और पोषण सुरक्षा- दोनों ही दृष्टिकोण से अनुकूल है लेकिन इस महत्वकांक्षी लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं होगा। दलहन मिशन को अपने रास्ते में अनेक चुनौतियों एवं बाधाओं का सामना करना पड़ेगा।
महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं गुजरात सहित अन्य प्रमुख दलहन उत्पादक प्रांतों में मौसम एवं जलवायु की स्थिति में तेजी से बदलाव हो रहा है और वहां फसलों को विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है।
महाराष्ट्र के विदर्भ एवं मराठवाड़ा संभाग में अत्यन्त जोरदार बेमौसमी वर्षा से खेतों में खरीफ दलहन फसलें बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई जिसमें अरहर (तुवर) की फसल विशेष रूप से शामिल है।
ज्ञात हो कि महाराष्ट्र तुवर का एक अग्रणी उत्पादक राज्य है। तुवर खरीफ सीजन की सबसे प्रमुख दलहन फसल मानी जाती है और राष्ट्रीय स्तर पर दलहनों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य हासिल करने में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहेगा। लेकिन दुर्भाग्य से इसके उत्पादन में वृद्धि के बजाए गिरावट देखी जा रही है।
सरकार का नीतिगत विजन बहुत ऊंचा है मगर जमीनी स्तर पर वास्तविकता उससे सर्वथा भिन्न नजर आ रही है। देश के वर्षा पर आश्रित क्षेत्रों में दलहनों का उत्पादन बढ़ाने के लिए गंभीर प्रयास की जरूरत है।
हालांकि केन्द्र सरकार ने संकल्प व्यक्त किया है कि वह किसानों से तुवर, उड़द एवं मसूर का शत-प्रतिशत स्टॉक खरीदेगी और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) अवश्य प्राप्त होगा लेकिन इससे उत्पादक ज्यादा उत्साहित नहीं हैं क्योंकि विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं से दलहन फसलों के नुकसान के एवज में उन्हें पर्याप्त मुआवजा नहीं मिल पाता है।
महाराष्ट्र के कई भागों में अत्यन्त मूसलाधार वर्षा एवं भयंकर बाढ़ के कारण खेतों में लम्बे समय तक पानी भरा रहा जिससे तुवर की फसल लगभग पूरी तरह बर्बाद हो गई। वहां चुनौती न्यूनतम समर्थन मूल्य पर दलहन खरीदने की नहीं बल्कि किसानों का अस्तित्व और मनोबल बचाने की है।
