धान की बजाए अन्य फसलों का रकबा बढ़ने पर पानी की होगी भारी बचत

17-Sep-2024 04:16 PM

नई दिल्ली । कृषि विशेषज्ञों का कहना है की यदि धान का उत्पादन क्षेत्र घटाकर दलहन, तिलहन एवं मोटे अनाजों का बिजाई क्षेत्र बढ़ाया जाए तो भूमिजल एवं भूमिगत जल की भारी बचत होगी और खासकर उत्तरी राज्यों में पानी की कमी का संकट दूर करने में बहुत सहायता मिलेगी।

विशेषज्ञों के मुताबिक अगर धान के रकबे में 40 प्रतिशत की कटौती हो जाए और उसमें अन्य फसलों की खेती की जाए तो पानी की कमी नहीं रहेगी।

उत्तरी भारत में वर्ष 2000 से अब तक 60 से 100 क्यूबिक कि० मी० पानी गायब हो चुका है जिसकी रिकवरी धान का रकबा घटाकर की जा सकती है। धान की खेती पहले अधिकतर वर्षा पर आश्रित इलाकों में होती थी मगर अब अधिकांश क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो गई है।

ध्यान देने की बात है कि धान की फसल पानी की सर्वाधिक जरूरत पड़ती है। यदि समय रहते इस तरफ उचित ध्यान नहीं दिया गया तो 13 से 43 क्यूबिक कि०मी० पानी की और बर्बादी हो सकती है। 

कृषि वैज्ञानिकों विशेषज्ञों एवं शोधकर्ताओं ने धान के उत्पादन क्षेत्र में क्रमिक रूप से कटौती करने का सुझाव दिया है और उत्पादन में गिरावट को रोकने के लिए उच्च उपज दर वाली किस्मों का दायरा बढ़ाने की सिफारिश की है।

पंजाब हरियाणा जैसे राज्यों में इन उपायों को तत्काल बड़े पैमाने पर लागू करने की सख्त आवश्यकता है क्योंकि वहां जल स्तर तेजी से घटता जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वार्मिंग का असर आगामी वर्षों में हालत और भी बिगाड़ सकते हैं। इससे जल सुरक्षा एवं खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

वर्तमान समय में ग्लोबल वार्मिंग का स्तर 1.5-3.0 डिग्री सेल्सियस चल रहा है और इसके तहत 13 से 43 क्यूबिक कि० मी० पानी की बचत होने की संभावना है जबकि धान के रकबे में 37 प्रतिशत की कटौती होने पर 61 से 108 क्यूबिक कि० मी० पानी का बचाव हो सकता है। 

भारत अत्यन्त विशाल देश है और इसकी खाद्य सुरक्षा के लिए धान चावल का पर्याप्त उत्पादन होना आवश्यक है। इसके अलावा भारत दुनिया में चावल का सबसे बढ़ा निर्यातक देश भी बना हुआ है और इस पोजीशन को बरकरार रखना जरुरी है। ऐसी हालत में धान के रकबे में 35-40 प्रतिशत की कटौती करना बहुत मुश्किल और चुनौती पूर्ण काम है।