धान के रकबे में निरंतर वृद्धि होने से जल संकट घहराने की आशंका
30-Dec-2025 08:46 PM
चंडीगढ़। भारत पिछले 12-13 साल से दुनिया में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक एवं दूसरा सबसे प्रमुख उत्पादक देश बना हुआ है। यह धान के उत्पादन क्षेत्र में निरंतर भारी वृद्धि हो रही है। 2025 के खरीफ सीजन में राष्ट्रीय स्तर पर इसका रकबा तेजी से बढ़कर 441 लाख हेक्टेयर के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा।
उल्लेखनीय है कि धान की फसल को सिंचाई की सर्वाधिक आवश्यकता पड़ती है और उसके लिए स्थलीय पानी के साथ-साथ जमीन के नीचे उपलब्ध जल का भी बड़े पैमाने पर उपयोग होता है।
पंजाब-हरियाणा में भूमिगत जल का स्तर लगातार तेजी से घटता जा रहा है। एक दशक पूर्व वहां जमीन के 30 फीट नीचे पानी मिल जाता था लेकिन अब बोरवेल के लिए 80 से 200 फीट तक खुदाई करनी पड़ती है।
पिछले पांच वर्षों के दौरान इन दोनों राज्यों में नल स्रोतों का अंधाधुंध इस्तेमाल हुआ है और इसका सिलसिला अब भी जारी है।
चावल के उत्पादन में भारत भले ही चीन को पीछे छोड़कर नंबर वन पोजीशन पर पहुंच गया है लेकिन इस उपलब्धि के लिए देश को गंभीर खामियाजा भी भुगतना पड़ रहा है।
जल संरक्षण पर यदि गम्भीरतापूर्वक ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में अनेक चुनोतियां एवं समस्या उत्पन्न हो सकती है।
पंजाब-हरियाणा में धान की औसत उपज दर सबसे ऊंची इसलिए रहती है क्योंकि वहां रासायनिक उर्वरकों, जल स्रोतों एवं कीटनाशी दवाओं का अधिक से अधिक इस्तेमाल किया जाता है।
इससे पर्यावरण तथा मिटटी की उर्वरा शक्ति पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। चालू वर्ष के दौरान पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान जैसे कम वर्षा वाले राज्यों में दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान हद से ज्यादा बारिश हो गई
इसलिए जल संकट का अभाव नहीं हुआ मगर जब मानसून की वर्षा कम होगी तब वहां पानी का अभाव बहुत हद तक महसूस होगा।
