अमरीका और चीन के बीच ट्रेड वार खतरनाक मोड़ पर पहुंचा
10-Apr-2025 07:42 PM
नई दिल्ली। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था वाले देश- अमरीका और चीन के बीच व्यापारिक युद्ध की तीव्रता काफी बढ़ गई है।
अमरीका ने चाइनीज उत्पादों पर 125 प्रतिशत तथा चीन ने अमरीकी उत्पादों पर 84 प्रतिशत का भारी-भरकम आयात शुल्क लगा दिया है।
इससे दोनों देशों के बीच व्यापार में भारी गतिरोध उत्पन्न होने की आशंका है। इस नई टैरिफ नीति का वैश्विक बाजार पर गहरा असर पड़ेगा।
उल्लेखनीय है कि चीन में अमरीका से गेहूं, सोयाबीन एवं मक्का जैसे महत्वपूर्ण कृषि उत्पादों का आयात बड़े पैमाने पर होता है।
वहां 84 प्रतिशत का सीमा शुल्क लगने पर अमरीका से इसका आयात ठप्प पड़ सकता है जिससे यूरोपीय, संघ, ऑस्ट्रेलिया, यूक्रेन, रूस, ब्राजील एवं अर्जेन्टीना जैसे देशों को फायदा हो सकता है।
दूसरी ओर चीन का विशाल बाजार हाथ से निकलने पर अमरीकी निर्यातकों को नए-नए बाजारों को तलाश करनी पड़ेगी लेकिन समस्या यह है अमरीकी प्रशासन ने अनेक देशों के उत्पादों पर टैक्स बढ़ा दिया है और वे देश भी अमरीकी उत्पादों पर उसी अनुपात में टैरिफ बढ़ाने का प्लान बना रहे हैं।
इससे अमरीकी निर्यात को गहरा धक्का लग सकता है। इसी तरह अमरीका में ऊंचे दाम पर आयात शुरू होने पर महंगाई में भारी बढ़ोत्तरी हो सकती है।
अमरीकी टैरिफ का असर चीन पर भी पड़ेगा क्योंकि वहां से अमरीका को अनेक वस्तुओं का बड़े पैमाने पर निर्यात होता है जिसमें अब भारी गिरावट आ सकती है।
आगामी समय में वैश्विक कारोबार का ढांचा कुछ बदल सकता है। हालांकि अमरीकी राष्ट्र्पति ने 9 अप्रैल को जो नई घोषणा की है उससे कई देशों को तात्कालिक रूप से राहत मिलने की उम्मीद है।
अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा कि नई तारीफ के पूरी तरह प्रभावी होने के लिए 90 दिनों का समय दिया गया है। इस बीच जो देश अपने बाजारों के लिए अमरीकी उत्पादों की पहुंच सुनिश्चित करने हेतु जितनी सुविधा प्रदान करेंगे उन्हें टैरिफ में उसी अनुपात में रियायत दी जा सकती है।
अमरीकी राष्ट्रपति ने चाइनीज उत्पादों पर 125 प्रतिशत का आयात शुल्क लगाने की घोषणा करते हुए कहा कि देर सबेर चीन को यह महसूस होगा कि अमरीका में सुविधा प्राप्त करने का समय समाप्त हो चुका है।
अन्य देशों को भी इसी तरह का अहसास होगा। राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि 75 से अधिक देशों ने अमरीका के साथ बातचीत करने की इच्छा जताई है इसलिए टैरिफ को पूरी तरह लागू नहीं किया जा रहा है। तीन महीने तक संबंधित देशों के निर्णय का इंतजार करने के बाद आगे की रणनीति बनाई जाएगी।
