चीनी, चावल, गेहूं एवं खाद्य तेलों की स्थिति पर खाद्य सचिव का स्पष्टीकरण
20-Dec-2024 12:53 PM
नई दिल्ली । इंडियन शुगर एंड बायो एनर्जी मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन (इस्मा) की वार्षिक आम बैठक में भाग लेने के बाद केन्द्रीय खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने पत्रकारों को चीनी, चावल, गेहूं एवं खाद्य तेल जैसे दैनिक उपयोग के आवश्यक खाद्य उत्पादों की स्थिति एवं इसके निर्यात- आयात के लिए सरकार के नीतिगत निर्णयों में होने वाले बदलाव के बारे में जानकारी दी।
खाद्य सचिव ने कहा कि चीनी के निर्यात की अनुमति देने पर कोई निर्णय एथनॉल की घरेलू जरूरतों को पूरा होने के बाद ही किया जा सकेगा।
उन्होंने स्वीकार किया कि 2024-25 के वर्तमान मार्केटिंग सीजन में भारत के पास निर्यात उद्देश्य के लिए लगभग 10 लाख टन चीनी का अधिशेष स्टॉक उपलब्ध रहेगा।
उनका कहना था कि उत्पादन तथा उपयोग के वर्तमान स्तर पर तमाम जरूरतों को पूरा करने के बाद करीब 10-12 लाख टन चीनी का अधिशेष स्टॉक बचेगा लेकिन इसके निर्यात का निर्णय तभी लिया जाएगा जब सरकार इस बात से पूरी तरह संतुष्ट हो जाएगी कि एथनॉल की मांग पूरी हो सकती है।
केन्द्र सरकार ने 2024-25 के वर्तमान मार्केटिंग सीजन (अक्टूबर-सितम्बर) में 320 लाख टन चीनी के घरेलू उत्पादन का अनुमान लगाया है जबकि उद्योग के पास करीब 79 लाख टन का पिछला बकाया स्टॉक मौजूद था। इस तरह मार्केटिंग सीजन में चीनी की उपलब्धता 400 लाख टन के करीब पहुंच जाएगी।
इसमें से 290 लाख टन चीनी का घरेलू उपयोग होने तथा 40 लाख टन चीनी का इस्तेमाल एथनॉल निर्माण में किए जाने का अनुमान लगाया गया।
इसके फलस्वरूप सीजन के अंत में लगभग 69 लाख टन चीनी का अधिशेष स्टॉक बचेगा। उद्योग के पास अगले मार्केटिंग सीजन के शुरूआती ढाई महीनों की घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए लगभग 57-59 लाख टन चीनी का स्टॉक होना आवश्यक है जबकि वास्तविक स्टॉक इससे 10-12 लाख टन ज्यादा रह सकता है।
खाद्य सचिव के अनुसार भारतीय खाद्य निगम द्वारा एथनॉल निर्माताओं को बिक्री के लिए 23 लाख टन चावल आवंटित किया गया है लेकिन ऊंचे दाम के कारण इसकी बिक्री की गति काफी धीमी है और इसके बारे में विचार किया जा रहा है।
खाद्य तेलों का घरेलू बाजार भाव कुछ तेज हुआ है मगर यह अनियंत्रित स्थिति में नहीं है। वैश्विक बाजार में प्रचलित कीमतों के अनुरूप घरेलू बाजार में भाव ऊपर-नीचे होता रहता है। भारत को 55-57 प्रतिशत खाद्य तेलों की घरेलू मांग को विदेशों से आयात के जरिए पूरा करना पड़ता है।
