चीन में भारतीय रेपसीड मील का निर्यात तेजी से बढ़ने की उम्मीद
10-Apr-2025 04:39 PM
मुम्बई। चीन की संघीय सरकार द्वारा कनाडा के कैनोला पर 100 प्रतिशत का भारी-भरकम आयात शुल्क लगाए जाने से चाइनीज आयातक भारतीय रेपसीड मील (खल सरसों) की खरीद में जोरदार सक्रियता दिखा सकते हैं जिसके आरंभिक संकेत भी मिलने लगे हैं।
प्राप्त सूचना के अनुसार चीन के आयातकों द्वारा पिछले तीन सप्ताहों के दौरान लगभग 52,000 टन भारतीय रेपसीड मील की खरीद की गई जो वर्ष 2024 की सम्पूर्ण अवधि की खरीद से करीब चार गुणा ज्यादा है।
कनाडा द्वारा कुछ चाइनीज उत्पादों पर आयात शुल्क में वृद्धि किए जाने के बाद चीन ने भी बदले की कार्रवाई के तहत कनाडाई कैनोला सहित कुछ अन्य उत्पादों के आयात पर ऊंचे स्तर का सीमा शुल्क लगा दिया।
व्यापार विश्लेषकों के अनुसार चीन में भारतीय रेपसीड मील का निर्यात बढ़ने से उसे कनाडाई कैनोला के आयात पर निर्भरता घटाने में सहायता मिलेगी और भारत में सरसों खल के घरेलू बाजार भाव पर दबाव में कमी आएगी।
देश में सरसों खल का विशाल स्टॉक मौजूद है जबकि आगे इसका उत्पादन और भी बढ़ने की उम्मीद है क्योंकि नई सरसों की भारी आवक शुरू हो चुकी है।
एक अग्रणी निर्यातक फर्म के अनुसार चीन के आयातकों ने भारतीय रेपसीड मील की खरीद में दिलचस्पी दिखानी शुरू कर दी है जो एक शुभ संकेत है।
पिछले कुछ सप्ताहों से इसका बढ़िया कारोबार हो रहा है और आगे भी स्थिति बेहतर रहने की उम्मीद है। चीन ने कनाडा से साबुत कैनोला, इसके तेल एवं ऑयल मील पर 100 प्रतिशत का आयात शुल्क लगा दिया है जो 20 मार्च 2025 से प्रभावी हो चुका है।
चीन के आयातकों द्वारा तात्कालिक शिपमेंट के लिए 220 से 235 डॉलर प्रति टन की दर से भारतीय रेपसीड का अनुबंध किया गया है जिसमें शिपमेंट खर्च भी शामिल है।
उल्लेखनीय है कि भारत दुनिया में सरसों-रेपसीड का तीसरा सबसे प्रमुख उत्पादक देश है लेकिन अपेक्षाकृत ऊंचे मूल्य के कारण चीन को भारी मात्रा में रेपसीड मील का निर्यात करने में भारतीय निर्यातकों को कठिन संघर्ष करना पड़ रहा है। अब यह स्थिति बदल सकती है।
वर्ष 2024 में चीन द्वारा कनाडा से 20.20 लाख टन, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से 5.04 लाख टन तथा रूस से 1.35 लाख टन रेपसीड मील का आयात किया गया जबकि भारत से केवल 13,100 टन का आयात किया गया।
हालांकि भारत से कुल मिलाकर 20 लाख टन से अधिक रेपसीड मील का निर्यात किया गया मगर इसमें चीन के आयात की भागीदारी 1 प्रतिशत से भी कम रही।
चीन में विशाल मात्रा में रेपसीड मील की मांग रहती है और यदि भारत को यह बाजार हासिल हो गया तो भारतीय उत्पादकों एवं निर्यातकों को काफी राहत मिल सकती है। चीन इसका एक अग्रणी खरीदार बन सकता है।
