गेहूं तथा दलहनों पर लागू नियंत्रणों को हटाने का सही समय आ गया

16-Jul-2025 12:23 PM

नई दिल्ली। खाद्य महंगाई में भारी गिरावट आने तथा आपूर्ति एवं उपलब्धता की स्थिति सुगम होने से सरकार को खासकर गेहूं एवं दलहनों पर लागू नियंत्रणों को हटाने पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है। प्राप्त जानकारी के अनुसार जून 2025 में खाद्य महंगाई पर पिछले 6 वर्ष के सबसे निचले स्तर पर आ गई। फरवरी 2019 के बाद उसका स्तर सबसे नीचे रहा। 

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक गेहूं में महंगाई दर मई में 6.43 प्रतिशत से गिरकर जून में 5.44 प्रतिशत रह गई। अनेक मंडियों में इसका दाम घटकर न्यूनतम समर्थन मूल्य के आसपास आ गया है। इसकी आपूर्ति एवं उपलब्धता की स्थिति सुगम बनी हुई है और कीमतों में स्थिरता या नरमी का रुख बना हुआ है।

किसानों को अपने उत्पाद का आकर्षक मूल्य प्राप्त करने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ रहा है। स्टॉक सीमा लागू रहने से व्यापारियों / स्टॉकिस्टों द्वारा अच्छी मात्रा में किसानों से गेहूं की खरीद नहीं की जा रही है।

भंडारण सीमा अब गैर प्रासंगिक हो गई है। स्वयं सरकार के पास इस महत्वपूर्ण खाद्यान्न का अच्छा खासा स्टॉक मौजूद है जिससे घरेलू बाजार में आने वाली तेजी को नियंत्रित किया जा सकता है। 

दाल-दलहनों में महंगाई लगातार घटती जा रही है। फरवरी 2025 से ही इसमें नरमी का सिलसिला जारी है और जून में यह लगातार पांचवें महीने घटकर 11.76 प्रतिशत रह गई जबकि अगस्त 2024 में यह 113 प्रतिशत के शीर्ष स्तर पर पहुंच गई थी।

इसके तहत खासकर तुवर के दाम में 25.11 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई। अधिकांश दलहनों- तुवर, उड़द, मूंग, मसूर एवं चना का थोक मंडी भाव घटकर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के आसपास या उससे नीचे आ गया।

विदेशों से सस्ते दलहनों का विशाल आयात जारी है और आगे भी बरकरार रहेगा। व्यापारियों / मिलर्स को सरकारी पोर्टल पर प्रत्येक सप्ताह अपने स्टॉक का विवरण देना अनिवार्य कर दिया गया है जबकि बाजार की वर्तमान स्थिति को देखते हुए इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। 

दिल्ली ग्रेन मर्चेंट्स एसोसिएशन (डीजीएमए) के वाइस प्रेसिडेंट गौरव गुप्ता ने हाल ही में एक खुले पत्र के माध्यम से यह मामला उठाते हुए सरकार से अनावश्यक नियंत्रणों को हटाने का आग्रह किया था। खाद्यान्न का भाव कमजोर पड़ने से किसानों को नुकसान हो रहा है। 

हालांकि सरसों तेल एवं रिफाइंड तेल में महंगाई दर क्रमश: 18.28 प्रतिशत एवं 23.55 प्रतिशत दर्ज की गई मगर इसका कारण वैश्विक बाजार भाव का ऊंचा रहना माना जा रहा है।