जलवायु परिवर्तन से फसलों की उपज दर प्रभावित होने की आशंका

11-Dec-2024 01:09 PM

नई दिल्ली । प्रमुख फसलों पर जलवायु परिवर्तन के पड़ने वाले प्रभाव का आंकलन-विश्लेषण करने हेतु भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा किए गए अध्ययन से खुलासा हुआ है कि सटीक सामयिक एवं व्यावहारिक उपायों के अभाव में जलवायु परिवर्तन की वजह से वर्षा पर आश्रित क्षेत्रों में धान की औसत उपज दर में वर्ष 2050 तक 20 प्रतिशत और वर्ष 2080 तक 47 प्रतिशत की जोरदार गिरावट आ सकती है।

इसके मुकाबले सिंचाई सुविधा वाले इलाकों में कम असर पड़ेगा और वहां चावल की उपज दर वर्ष 2050 तक 3.5 प्रतिशत तथा वर्ष 2080 तक 5 प्रतिशत घटने की संभावना है। 

समीक्षाधीन अवधि के दौरान गेहूं की औसत उपज दर में क्रमश: 19.3 प्रतिशत एवं 40 प्रतिशत की गिरावट आने का अनुमान लगाया गया है  जबकि खरीफ कालीन मक्का की उत्पादकता में वर्ष 2050 तक 10 से 19 प्रतिशत की कमी आने की आशंका जताई गई है।

केन्द्रीय कृषि  राज्य मंत्री के अनुसार केन्द्र सरकार समय-समय पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का आंकलन करने हेतु आईसीएआर के माध्यम से अध्ययन करवाती है ताकि इसके नकारात्मक असर से कृषि क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए सही समय पर आवश्यक एहतियाती कदम उठाया जा सके।

दरअसल कार्बन डाय ऑक्साइड के बढ़ते उत्सर्जन तथा तापमान में हो रही बढ़ोत्तरी के कारण विभिन्न फसलों की पोषण क्वालिटी पर गहरा प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

उसमें पोषक तत्वों की कमी होती जा रही है जिसे रोकना आवश्यक है। शुरूआती अध्ययन से पता चला है कि कार्बन डाय ऑक्साइड एवं ऊंचे तापमान की वजह से मक्का की कुछ खास जीनो राईस (किस्म) में आयरन, जिंक एवं प्रोटीन का अंश घट गया है।

चावल के दाने की क्वालिटी पर भी इसका नकारात्मक असर देखा जा रहा है। इससे उसमें मिनरल्स तथा पोषण संरचना में बदलाव आ गया है। 

जहां तक गेहूं की बात है तो बढ़ती गर्मी के कारण इसके दाने चपटे एवं छोटे होने लगे हैं और उसमें स्टार्च तथा प्रोटीन का अंश घटने लगा है।

इसके फलस्वरूप गेहूं की उपज दर में कमी आने की आशंका बढ़ गई है। जब दाना पुष्ट होने के चरण में पहुंचता है तब यदि जरूरत से ज्यादा बारिश होती है और खेतों में पानी भर जाता है तब गेहूं के दाने बदरंग होने लगते हैं।