कमजोर बाजार भाव के कारण सोयाबीन की खेती के प्रति किसान असमंजस में

27-May-2025 03:52 PM

इंदौर। केन्द्र सरकार ने 2024-25 के खरीफ मार्केटिंग सीजन हेतु सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य में सोयाबीन की खरीद भी की थी। लेकिन इससे सीमित संख्या में ही किसानों को राहत मिल सकी जबकि शेष उत्पादकों को औने-पौने दाम पर अपना तिलहन बेचने के लिए विवश होना पड़ा।

इससे उसकी चिंता, निराशा और दुविधा बढ़ गई है। मध्य प्रदेश के सोयाबीन उत्पादकों को अनेक चुनौतियों एवं समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिसमें मौसम एवं मानसून की अनिश्चित एवं अनियमित स्थिति, लागत खर्च में हो रही वृद्धि, आमदनी में कमी और बाजार की बदलती हालत आदि शामिल है। 

देश के दो शीर्ष उत्पादक राज्यों- मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र में सोयाबीन पहले अनेक किसानों की आजीविका का प्रमुख स्रोत माना जाता था और इसलिए इसकी खेती में उत्पादकों का उत्साह एवं आकर्षण बरकरार था। देश में सोयाबीन के सकल उत्पादन में मध्य प्रदेश की भागीदारी 54 प्रतिशत तथा महाराष्ट्र की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत रहती थी लेकिन बाद में महाराष्ट्र का योगदान तेजी से बढ़ने लगा।

खाद, बीज एवं श्रमिकों का खर्च बढ़ने से किसानों को कठिनाई होने लगी और कमजोर बाजार मूल्य के कारण उसे लागत खर्च की वापसी के लिए भी कठिन संघर्ष करना पड़ रहा है। इसके फलस्वरूप सोयाबीन की खेती के प्रति इस बार उत्पादकों का उत्साह एवं  आकर्षण कुछ घटने की संभावना व्यक्त की जा रही है। 

किसान संगठनों का कहना है कि अगर उत्पादकों को सोयाबीन का लाभप्रद मूल्य प्राप्त नहीं होगा तो इसकी खेती में उसकी दिलचस्पी घट जाएगी। 2024-25 के सीजन में सोयाबीन का थोक मंडी भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य की तुलना में 500 से 1000 रुपए प्रति क्विंटल तक नीचे रहा।

सरकारी खरीद तो ठीक है लेकिन किसानों को मंडी भाव ऊंचा रहना ज्यादा पसंद आएगा ताकि उसे नियमित रूप से अच्छी आमदनी प्राप्त हो सके। इसके लिए सोया तेल का दाम ऊंचा होना आवश्यक है। सोयाबीन तेल के सस्ते आयात पर अंकुश लगातार सोयाबीन का घरेलू बाजार भाव उचित स्तर पर पहुंचाया जा सकता है।