मानसून का जल्दी आना हमेशा अच्छा नहीं होता है
26-May-2025 08:06 PM
नई दिल्ली। हालांकि भारतीय किसानों को दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन का बेसब्री से इंतजार रहता है क्योंकि खरीफ कालीन फसलों की बिजाई एवं प्रगति के लिए इसकी बारिश आवश्यक होती है लेकिन कई बार मानसून देर से पहुंचता है या फिर शुरूआती सक्रियता के बाद कई दिनों तक निष्क्रिय हो जाता है।
मौसम विभाग ने इस वर्ष 27 मई को देश में मानसून के पहुंचने की संभावना व्यक्त की है जबकि इसकी नियत तिथि 1 जून मानी जाती है। इस बार नियत समय से पहले ही मानसून के आने की उम्मीद है जो एक अच्छा संकेत है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून का जल्दी आना हमेशा अच्छा नहीं होता है।
स्वयं मौसम विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि यद्यपि 2009 में मानसून अपने नियत समय से काफी पहले आ गया था लेकिन बाद में इसकी रफ्तार एवं सक्रियता इतनी घट गई
कि पूरे सीजन के दौरान दीर्घकालीन औसत की तुलना में कुछ वर्षा में 23 प्रतिशत की भारी गिरावट आ गई और खरीफ फसलों को भारी नुकसान हो गया। वर्ष 2009 में मानसून 23 मई को ही भारत में सक्रिय हो गया था।
देश के दक्षिण एवं पूर्वोत्तर भाग में मानसून सबसे पहले पहुंचता है और उसके बाद आगे बढ़ते हुए अन्य क्षेत्रों को कवर करता है। इस बार मानसून के जल्दी आने से अच्छी वर्षा की उम्मीद तो की जा रही है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इससे समूचे देश ठोस प्रदर्शन एवं वर्षा के समान वितरण की गारंटी नहीं दी जा सकती है। आगामी समय में बारिश का प्रदर्शन अच्छा, सामान्य या खराब-कुछ भी हो सकता है।
कई राज्यों में बारिश का दौर अभी जारी है और अगले कुछ दिनों तक बरकरार रह सकता है। आमतौर पर मानसून शुरूआती चरण में कुछ दिनों तक दक्षिण भारत में घूमते रहने के बाद आगे बढ़ता है।
इस बार भी कुछ वैसा ही हो सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि मानसून की सघनता, तीव्रता एवं गतिशीलता के लिए अरब सागर एवं बंगाल की खाड़ी के ऊपर वायु के प्रवाह की गति अनुकूल होनी चाहिए।
