दालों का खुदरा मूल्य घटाने की जरूरत पर जोर

04-Mar-2025 11:21 AM

मुम्बई। पिछले दो-तीन माह से थोक मंडियों में विभिन्न साबुत दलहनों का भाव नरम चल रहा है और इसमें 15 से 25 प्रतिशत तक की गिरावट आ चुकी है लेकिन उसके अनुरूप दालों के खुदरा मूल्य में कमी नहीं आई है। इससे आम उपभोक्ताओं तक समुचित लाभ नहीं पहुंच रहा है।

हाल के महीनों में जिन दलहनों की कीमतों में सबसे ज्यादा गिरावट आई है उसमें तुवर और चना मुख्य रूप से शामिल है। उल्लेखनीय है कि ये दोनों अलग-अलग सीजन के दलहन है।

अरहर (तुवर) की खेती खरीफ सीजन में तथा चना की पैदावार रबी सीजन में होती है। तुवर की परिपक्वता अवधि लम्बी होती है इसलिए इसके नए माल की आवक दिसम्बर-जनवरी में शुरू होती है और फरवरी-मार्च में आपूर्ति की रफ्तार ऐसे समय में तेज हो जाती है जब रबी कालीन दलहनों- खासकर चना का नया माल मंडियों में पहुंचने लगता है। 

दरअसल विदेशों से विशाल मात्रा में (30 लाख टन से अधिक) पीली मटर का शुल्क मुक्त आयात होने से अन्य दलहनों और विशेषकर देसी चना की मांग प्रभावित हुई।

स्वयं देसी चना का आयात भी बहुत बढ़ गया क्योंकि सरकार ने मई 2024 में इसे शुल्क मुक्त कर दिया था। तुवर, उड़द एवं मसूर का भी जोरदार आयात किया गया जिससे घरेलू प्रभाग में दलहनों की आपूर्ति न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से भी नीचे आ गया। 

दलहनों के थोक मूल्य में आई गिरावट का पूरा असर अभी तक दालों के खुदरा बाजार भाव पर नहीं देखा जा रहा है क्योंकि पुराने स्टॉक के माल की पूरी बिक्री नहीं हो पाई है जिसकी खरीद ऊंचे दाम पर की गई थी। लेकिन जल्दी ही दालों की कीमतों में नरमी आने की उम्मीद की जा रही है।

इस बीच पीली मटर के शुल्क मुक्त आयात की समय सीमा 28 फरवरी 2025 से आगे नहीं बढ़ाए जाने से दलहनों के दाम में कुछ सुधार आने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

वैसे म्यांमार से उड़द एवं तुवर तथा ऑस्ट्रेलिया एवं कनाडा से मसूर का अच्छा आयात जारी है। ऑस्ट्रेलियाई चना भी भारतीय बंदरगाहों पर पहुंच रहा है क्योंकि इसके शुल्क मुक्त आयात की समय सीमा उड़द तथा मसूर के साथ 31 मार्च 2025 को खत्म होने जा रही है।

उम्मीद की जा रही है कि उड़द तथा मसूर के शुल्क मुक्त आयात की अवधि आगे बढ़ाई जा सकती है लेकिन चना के बारे में कृषि मंत्रालय का उत्पादन अनुमान सामने आने के बाद निर्णय लिया जा सकता है।