दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता के लिए गंभीर प्रयास की जरूरत

14-Jan-2026 08:38 PM

मुम्बई। ग्लोबल पल्सेस कॉन फेडरेशन (जीपीसी) के सलाहकार निदेशक मंडल के एक सदस्य ने कहा है कि भारत में केन्द्र सरकार प्रत्येक वर्ष दलहनों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में अच्छी बढ़ोत्तरी तो करती है लेकिन यह केवल सांकेतिक बन कर रह गई है।

दरअसल दलहनों के उत्पादन में हो रही वृद्धि  के अनुरूप एमएसपी पर किसानों से इसकी खरीद में पर्याप्त इजाफा नहीं हो रहा है और उत्पादकों को अक्सर एमएसपी से काफी नीचे दाम पर अपना दलहन बेचने के लिए विवश होना पड़ता है। 

इस विश्लेषक का कहना है कि सरकार द्वारा आरंभ किया गया 'दलहनों में आत्मनिर्भरता का मिशन एक सराहनीय कदम है लेकिन निकट भविष्य में दलहनों के उत्पादन में भारत के आत्मनिर्भर होने की संभावना बहुत कम है क्योंकि एमएसपी पर दलहनों की अनियमित खरीद होने तथा विदेशों से सस्ते माल का विशाल आयात जारी रहने से किसानों को उत्पादन बढ़ाने का समुचित प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। सरकार को आगे कुछ और गंभीर प्रयास करने होंगे और खासकर किसानों को प्रेरित-प्रोत्साहित करना होगा। 

सरकार द्वारा खरीफ सीजन में तीन दलहनों-अरहर (तुवर), उड़द एवं मूंग तथा रबी सीजन में दो दलहनों-चना एवं मसूर के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की जाती है।

2025-26 के मार्केटिंग सीजन के लिए इन दलहनों के एमएसपी में 86 से लेकर 450 रुपए प्रति क्विंटल तक की बढ़ोत्तरी की गई

लेकिन एमएसपी पर दलहनों की खरीद कुल निर्धारित लक्ष्य से काफी पीछे चल रही है। फिलहाल खरीफ कालीन दलहनों की सरकारी खरीद हो रही है जबकि रबी कालीन दलहनों (चना-मसूर) की खरीद आगामी महीनों में होगी।

पिछले रबी मार्केटिंग सीजन में सरकार ने करीब 28 लाख टन चना की खरीद का कोटा आवंटित किया था लेकिन इसकी वास्तविक खरीद महज 3.50 लाख टन तक ही पहुंच सकी।

इस बार खरीफ कालीन तुवर एवं मूंग की खरीद के प्रस्ताव को काफी देरी से यानी दिसम्बर 2025 में मंजूरी दी गई इसलिए कुछ राज्यों में इसकी प्रक्रिया अभी तक शुरू भी नहीं हो पाई है।