अक्टूबर में पाम तेल के आयात में भारी गिरावट के संकेत

11-Nov-2025 01:14 PM

नई दिल्ली। स्टॉक पोजीशन बेहतर होने तथा मांग कमजोर पड़ने से अक्टूबर 2025 के दौरान भारत में पाम तेल का आयात घटकर गत पांच माह के निचले स्तर पर आ जाने का अनुमान है।

पाम तेल का वैश्विक बाजार मूल्य भी अपेक्षाकृत ऊंचा रहा। उद्योग-व्यापार क्षेत्र के विश्लेषकों का मानना है कि अक्टूबर 2025  के दौरान देश में खाद्य तेलों का कुल आयात 12.50-12.80 लाख टन के बीच हुआ जो अक्टूबर 2024 के आयात से 10-12 प्रतिशत कम है।

इससे पूर्व सितम्बर 2025 के दौरान खाद्य तेलों का आयात उछलकर 16 लाख टन के उच्च स्तर पर पहुंच गया था। अखाद्य तेलों को मिलाकर वनस्पति तेल का सकल आयात 16.40 लाख टन दर्ज किया गया था। 

एक अग्रणी उद्योग संस्था- सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सी) के आंकड़ों से पता चलता है कि 2024-25 के मार्केटिंग सीजन (नवम्बर-अक्टूबर) के शुरूआती 11 महीनों में यानी नवम्बर 2024 से सितम्बर 2025 के दौरान देश में वनस्पति तेलों का कुल आयात घटकर 143 लाख टन पर अटक गया जो 2023-24 सीजन की समान अवधि के आयात 148 लाख टन से 3 प्रतिशत या 5 लाख टन कम था।

अक्टूबर माह के आयात का आंकड़ा एसोसिएशन द्वारा अगले कुछ दिनों में जारी किए जाने की संभावना है और तब 2024-25 सीजन की सम्पूर्ण अवधि के खाद्य तेल आयात का विश्वसनीय परिदृश्य सामने आएगा। 

एक अग्रणी विश्लेषक के अनुसार अक्टूबर में खाद्य तेलों के आयात में गिरावट आने का प्रमुख कारण पाम तेल का कम आयात होता है।

पाम तेल का भाव ऊंचा होने से इसकी खरीद में भारतीय रिफाइनर्स की दिलचस्पी घट गई। अक्टूबर में खरीफ कालीन तिलहन फसलों की कटाई- तैयारी भी आरंभ हो गई जिससे स्वदेशी स्रोतों से खाद्य तेल की आपूर्ति एवं उपलब्धता बढ़ने लगी। 

लेकिन सोयाबीन तेल की खरीद में भारत ने काफी उत्साह दिखाया जिससे इसका आयात 20 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 4.25 लाख टन के उच्च स्तर पर पहुंच जाने का अनुमान है।

दरअसल पाम तेल एवं सोया तेल के बीच मूल्यान्तर काफी घटने से उपभोक्ताओं का रुझान सोया तेल की तरफ ज्यादा हो गया।

सितम्बर में पाम तेल का औसत इकाई आयात खर्च गत वर्ष की तुलना में 9 प्रतिशत बढ़कर 1164 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गया जबकि क्रूड सोया तेल का आयात खर्च 1182 डॉलर प्रति टन रहा।

इस तरह दोनों खाद्य तेल के बीच आयात मूल्य का अंतर घटकर 20 डॉलर प्रति टन से भी नीचे आ गया जबकि पहले यह अंतर 120-140 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया था।