बढ़ते वैश्विक तापमान से अनाजों की उपज दर में गिरावट के संकेत

14-May-2025 03:29 PM

नई दिल्ली। ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन के प्रकोप से गेहूं, मक्का तथा जौ आदि अनाजों की औसत उत्पादकता दर प्रभावित होने लगी है। एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार यह कारक अनाजी  फसलों पर प्रतिकूल असर डाल रहा है और इसकी वजह से जौ की उपज दर में 13 प्रतिशत, गेहूं में 10 प्रतिशत तथा मक्का की उपज दर में 4 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है।

तापमान में बढ़ोत्तरी होने के साथ-साथ बारिश की हालत भी अनिश्चित एवं अनियमित रहती है। शुष्क एवं गर्म मौसम का सीधा असर फसल की प्रगति एवं फूल तथा दाना के विकास पर पड़ता है जिससे औसत उपज दर में कमी आ जाती है। कुछ इलाकों में फसलों की उत्पादकता दर ज्यादा घट रही है जो गंभीर चिंता का विषय है। 

अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वार्मिंग जैसी घटना नहीं होती तो गेहूं, मक्का और जौ का वैश्विक उत्पादन वर्तमान स्तर से कहीं ज्यादा होता।

इन फसलों के बिजाई क्षेत्र में कमी नहीं आ रही है मगर उपज दर घट रही है इसलिए कुल उत्पादन में अपेक्षित बढ़ोत्तरी नहीं हो रही है। एक तरफ गर्मी बढ़ रही है तो दूसरी ओर हवा में नमी कम देखी जा रही है।

यह सही है कि धान अथवा गन्ना के मुकाबले गेहूं, मक्का एवं जौ की फसल को पानी की कम आवश्यकता पड़ती है मगर इसकी एक सीमा होती है और इससे नीचे स्तर पर प्रतिकूल मौसम स्वाभाविक रूप से फसल को नुकसान पहुंचाता है।  

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन के प्रकोप या नकारात्मक असर को घटाने अथवा समाप्त करने के लिए तत्काल व्यापक स्तर पर समेकित एवं गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो भविष्य में वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बढ़ सकता है।

आगामी वर्षों में सिर्फ विकासशील या अल्प विकसित देशों में ही नहीं बल्कि अमरीका जैसे विकसित देश में भी विभिन्न फसलों का उत्पादन इन मौसमी घटनाओं से प्रभावित हो सकता है। वैश्विक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी देशों को मिलजुल कर इस समस्या से निपटने की आवश्यकता है। 

प्रमुख खाद्य फसलों के अलावा कॉफी, कोकोआ, नारंगी तथा जैतून आदि का उत्पादन भी ग्लोबल वार्मिंग से प्रभावित होने की आशंका है। यह किसी एक देश का मामला नहीं है बल्कि वैश्विक स्तर की समस्या है और इसे दूर करना सभी देशों का दायित्व है।