गेहूं के तथाकथित ऊंचे बाजार भाव की वास्तविकता- क्या सही में अधिक हैं गेहूं के भाव?

09-Sep-2024 01:51 PM

नई दिल्ली। हालांकि बाजार में कुछ लोगों द्वारा ऊंचे भाव का शोर मचाकर सरकार पर विदेशों से गेहूं के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति देने के लिए दबाव डाला जा रहा है लेकिन गौर से तथा आंकड़ों के आंकलन से देखा जाए तो वास्तविकता कुछ और ही नजर आती है। आंकड़ों से पता चलता है कि व्यापरियों / स्टॉकिस्टों के लिए कुल लागत खर्च और बाजार में प्रचलित मूल्य लगभग समान ही है। इसका समीकरण समझने के लिए कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों पर ध्यान देने आवश्यक है। 


उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2023 के 2,125 रुपए प्रति क्विंटल से 150 रुपए बढ़ाकर 2024 के रबी मार्केटिंग सीजन के लिए 2,275 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया और राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में इस पर 125 रुपए प्रति क्विंटल का अतिरिक्त बोनस भी दिया गया।

सरकार को चालू वर्ष के दौरान गेहूं की कुल खरीद 340 लाख टन तक पहुंच जाने की उम्मीद थी मगर वास्तविक खरीद 268 लाख टन के करीब ही पहुंच सकी। इससे साफ पता चलता है कि खुले बाजार में किसानों को इस बार मिल क्वालिटी गेहूं का कुछ ऊंचा दाम प्राप्त हुआ। मोटे अनुमान के मुताबिक किसानों को गेहूं का औसतन 2,325 रुपए प्रति क्विंटल का मूल्य प्राप्त हुआ जो सरकारी समर्थन मूल्य से 50 रुपए प्रति क्विंटल ज्यादा है। इससे उत्पादकों को काफी राहत महसूस हुई है।

अब इस 2,325 रुपए प्रति क्विंटल के औसत मूल्य से ऊपर अन्य खर्चों को शामिल करके देखा जाए तो इसमें मंडी शुल्क, आढ़त (कमीशन), बारदाना, मजदूरी एवं गाड़ी भाड़ा (परिवहन खर्च) को मिलाकर गेहूं का कुल खरीद (लागत) खर्च बढ़कर 2,500 रुपए प्रति क्विंटल बैठती है। इसके बाद भंडारण खर्च एवं ब्याज के रूप में प्रति माह औसतन 27-28 रुपए प्रति क्विंटल का खर्च बैठता है। गत पांच माह का यह खर्च 150 रुपए प्रति क्विंटल रहा और वर्तमान स्थिति के अनुरूप विक्रेताओं के गोदाम पर मौजूद स्टॉक के गेहूं का लागत मूल्य 2,650 रुपए प्रति क्विंटल हो गया है। इसमें परिवहन सहित अन्य खर्चों को मिलाने पर इसका दिल्ली पहुंच भाव 2,730 रुपए प्रति क्विंटल बैठता है जबकि दिल्ली में गेहूं का भाव फिलहाल 2,830 रुपए प्रति क्विंटल बताया जा रहा है जिसमें कैश डिस्काउंट, बारदाना एवं दलाली मिलाने पर वास्तविक मूल्य 2,730 रुपए प्रति क्विंटल ही ठहरता है। विक्रेताओं का लागत मूल्य एवं बाजार में प्रचलित मूल्य में कोई खास अंतर नहीं है तो फिर गेहूं का भाव ऊंचा कैसे माना जा सकता है? अगर लागत ही अधिक बैठ रही है तो गेहूं उत्पाद- आटा, मैदा, सूजी पर भी इसका असर पड़ना स्वाभाविक है। 

खपत की बात करें तो 4 सदस्यों के परिवार में अधिकतम 18-20 किलो यानि साल में 240 किलो ही खाया जाता है। मान लें कि अगर गेहूं भाव 500 रूपये प्रति क्विंटल बढ़ते हैं तो सालाना केवल 1,200 रुपए (100 रुपए/महीना) अधिक महंगा पड़ता हैं। आज के समय एक समय रेस्टोरेंट में खाना खाने जाये तो 1 बार में इतना बिल आ जाता है। इन आंकड़ों में 80 करोड़ नागरिकों 5 किलो/सदस्य की रियायती गेहूं शामिल नहीं है। इसमें केवल वही उपभोक्ता शामिल हो जो इस खरीदने में सक्षम माना जाता है। 

कीमतों की नियंत्रित करने और बाज़ारों में उपलब्धता बनाये रखने की लिए सरकार द्वारा निर्यात को प्रतिबंधित किया गया, समय-समय पर स्टॉक लिमिट लगा कर लिमिट में बदलाव किये गए, OMSS के तहत बिक्री की गई।

आई-ग्रेन इंडिया का मानना है कि अगर यह कदम नहीं उठाये जाते तो बाज़ारों में तेजी को रोक पाना बहुत कठिन होता। इस समय बाजार वास्तविक डिमांड और सप्लाई पर चल रहे हैं।

गेंहूं की असल लागत को बिना बताये ऊँची कीमतों का उलाहना देते हुए, कई संघठन सरकार पर बना रहे हैं आयात खोलने का दवाब।

इन संघठनों और सरकार को कोई भी कदम उठाते से पहले अवश्य सोचना होगा कि क्या सहीं में भाव ऊँचे हैं। अगर दवाब बना कर आयात खोला गया तो क्या विदेशों में भाव नहीं बढ़ेंगे? 

क्या इसका सीधा असर बिजाई पर नहीं पड़ेगा? पिछले 3 सीजनों में उत्पादकता पर असर पड़ने के कारण केंद्रीय पूल में स्टॉक 1 दशक बाद निम्न स्तर पर आया।

खरीफ सीजन में हो रही बारिश आगामी रबी फसलों के लिए अच्छी, ऊँचे भाव मिलने से किसानों की रूचि गेहूं में बढ़ सकती है परन्तु, अगर आयात शुल्क में बदलाव किया गया तो स्तिथि बदलने में देर नहीं लगेगी।

कुल मिला कर आयात खोलना आगामी उत्पादन पर गहरा असर डाल सकता है, भारत में कम से कम लगातार 2 सीजनों में बम्पर उत्पादन चाहिए तभी स्टॉक स्तिथि और लागत कम बैठ सकती है।