मानसून में ठहराव चिंता का विषय
07-Jun-2025 11:38 AM
नियत तिथि से आठ दिन पूर्व ही देश की मुख्य भूमि में पहुंचने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून से इस बार काफी उम्मीदें लगाई जा रही है और किसानों को इस सीजन में भरपूर बारिश होने का भरोसा है। खरीफ फसलों के शानदार उत्पादन के लिए मानसून की अच्छी बारिश पहली शर्त मानी जाती है क्योंकि देश का अधिकांश भाव अब भी वर्षा पर ही आश्रित है। पिछले साल अच्छी वर्षा होने से कृषि उत्पादन में काफी सुधार आया था और खासकर चावल का उत्पादन बढ़कर नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। चालू वर्ष के दौरान 24 से 31 मई तक मानसून की जोरदार बारिश हुई जिससे किसानों के चेहरे खिलने लगे थे लेकिन 1 जून से मानसून में ठहराव आ गया और इसकी तीव्रता एवं गतिशीलता लगभग बंद हो गई। इससे गंभीर चिंता पैदा हो गई है। हालांकि मौसम विभाग ने जून माह के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर सामान्य से अधिक वर्षा होने का अनुमान व्यक्त किया है और इस पर विश्वास किया जाना चाहिए मगर माह के शुरूआती सात दिनों तक मानसून का काफी हद तक निष्क्रिय रहने का मतलब यह है कि देश में वर्षा के मासिक वितरण में कुछ विसंगति उत्पन्न हो जाएगी। मौसम विभाग का आंकड़ा कुल मासिक वर्षा पर आधारित होगा जबकि जरूरत नियमित और संतुलित बारिश की है। यूरोपीय मौसम पूर्वानुमान केन्द्र ने कहा कि अब मानसून जुलाई में ही अपनी पूरी क्षमता एवं गतिशीलता के साथ सक्रिय हो सकेगा। इसका मतलब यह हुआ कि चालू माह (जून) के दौरान मानसून या तो पूरी तरह सक्रिय नहीं रहेगा और यदि रहा तो भी इसका दायरा सीमित रह सकता है।
देश के विभिन्न भागों में ऊंचे तापमान एवं वर्षा के अभाव की वजह से किसानों को खरीफ फसलों की बिजाई के लिए अपने खेतों को तैयार करने में असुविधा हो रही है। बेशक दक्षिणी भारत और पूर्वोत्तर राज्यों के साथ-साथ महाराष्ट्र में भी इस बार भारी वर्षा हुई है लेकिन देश के शेष भागों को मानसून की बारिश का इंतजार है। इन राज्यों में पहुंचने का समय अभी समाप्त नहीं हुआ है इसलिए बहुत ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है। दरअसल इस बार मानसून के काफी जल्दी आ जाने से देश के विभिन्न भागों में नियत समय से पूर्व ही इसके पहुंचने की उम्मीद लगाई जा रही थी जो अब शायद संभव नहीं हो पाएगी। लेकिन इस बार हालात वर्ष 2009 जैसे रहने की आशंका भी नहीं है जब मानसून 23 मई को ही देश में पहुंच गया था लेकिन बाद में लम्बे समय तक के लिए गायब हो गया और इससे सूखे का संकट पैदा हो गया था।
