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23-Oct-2026 01:02 PM
भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार ने 2026-27 के खरीफ मार्केटिंग सीजन के लिए सोयाबीन के वास्ते भावान्तर भुगतान योजना को मंजूरी प्रदान कर दी है। इससे सरकारी एजेंसियों को किसानों से सोयाबीन की खरीद करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी लेकिन उत्पादकों को परोक्ष रूप से मूल्य समर्थन योजना का पूरा लाभ हासिल हो सकेगा। समझा जाता है कि कर्नाटक सरकार भी इस योजना को लागू करने पर विचार कर रही है।
मध्य प्रदेश सोयाबीन का सबसे प्रमुख उत्पादक राज्य है। वहां पिछले सीजन में भी भावान्तर भुगतान योजना को स्वीकृति मिली थी। शुरुआती दौर में इससे किसानों को थोड़ी कठिनाई हुई थी लेकिन बाद में स्थिति सामान्य हो गई। कर्नाटक यदि इस स्कीम को लागू करता है तो वहां भी किसानों को एमएसपी का परोक्ष फायदा होगा।
इस स्कीम के अंतर्गत किसानों को मान्यता प्राप्त थोक मंडियों में अपना उत्पाद बेचना पड़ता है और उसकी रसीद सरकार को दिखानी पड़ती है। यदि सोयाबीन की बिक्री न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम पर होती है तो उस मूल्यान्तर की क्षतिपूर्ति सरकार द्वारा की जाती है।
मध्य प्रदेश फिलहाल देश में अकेला ऐसा राज्य है जहां भावान्तर भुगतान योजना (पीडीपीएस) की स्वीकृति दी गई है। इसके तहत जब मंडी भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे होता है तब केन्द्र द्वारा 15 प्रतिशत तक के भावान्तर का भुगतान किया जाता है। लेकिन इसका दायरा किसी राज्य में उत्पादित जिंस के 25 प्रतिशत तक ही सीमित रहता है। यदि राज्य सरकार चाहे तो वह अपने स्तर से किसानों को कोई भी अतिरिक्त सहायता देने अथवा खरीद की सीमा बढ़ाने के लिए स्वतंत्र है।
पिछले खरीफ मार्केटिंग सीजन के दौरान मध्य प्रदेश में इस भावान्तर भुगतान योजना के अंतर्गत 7.20 लाख टन से अधिक किसानों को 1500 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया था जबकि रबी सीजन में सरसों का भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य से काफी ऊंचा था इसलिए भावान्तर भुगतान योजना के क्रियान्वयन की आवश्यकता नहीं पड़ी।