पंजाब के फिरोजपुर में लालमिर्च के बजाए धान की खेती पर जोर
14-Jul-2025 11:12 AM
चंडीगढ़। पंजाब के किसानों का उत्साह एवं आकर्षण धान की खेती के प्रति बरकरार है जिससे लालमिर्च की फसल पर उसका ध्यान घटता जा रहा है। खरीदारों के अभाव एवं कमजोर बाजार भाव के कारण फिरोजपुर जिले के किसानों ने मिर्च की की अपरिपक्व फसल वाले खेतों की जुताई करके उसमें धान की खेती आरम्भ कर दी है क्योंकि धान से उन्हें निश्चित मूल्य प्राप्त होने की गारंटी रहती है। उल्लेखनीय है कि फिरोजपुर पंजाब लालमिर्च (चिली) का अग्रणी उत्पादक जिला है।
हालाँकि हाल के वर्षों में फिरोजपुर जिले में फिरोजपुर जिले में लालमिर्च का बिजाई क्षेत्र तेजी से बढ़ा है। इसका क्षेत्रफल 2014-15 सीजन के 736 हेक्टेयर से उछलकर 2024-25 में 2732 हेक्टेयर पर पहुंच गया लेकिन हाल ही में समाप्त हुए सीजन के दौरान किसानों को अपने उत्पाद का लाभप्रद मूल्य हासिल नहीं होने से इस महत्वपूर्ण मसाला फसल की खेती में उसकी दिलचस्पी काफी घट गयी। वहां सूखी लालमिर्च का भाव 2023 में उछलकर 180 रुपए प्रति किलो के शीर्ष स्तर पर पहुंच गया था और वर्ष 2024 में भी 130 रुपए प्रति किलो के ऊंचे स्तर पर रहा था मगर चालू वर्ष के दौरान यह घटकर महज 60-70 रुपए प्रति किलो पर अटक गया।
उल्लेखनीय है कि फिज़ोरपुर जिले में मार्च 2023 में चिली क्लस्टर का शुभारम्भ किया गया था। किसानों ने लालमिर्च की खेती में उत्साह तो दिखाया था लेकिन जब बाजार भाव नरम पड़ने लगा तब उसकी बिजाई की रफ़्तार घटा दी और जितने क्षेत्र में बिजाई हुई थी उसके भी बड़े भाग में फसल को हटाकर उसमें धान की रोपाई कर दी। समझा जाता है कि 2024-25 के सीजन में पंजाब की लालमिर्च आंध्र प्रदेश की बेंचमार्क गुंटूर में नहीं पहुंच सकी क्योंकि रसायनों (कीटनाशकों) के अवशेष की उपस्थिति इसमें ज्यादा पायी गयी। फिरोजपुर के व्यापारियों ने जो निर्यात सैम्पल वहां भेजा था वह मानक स्तर पर खरा नहीं उतर सका। दरअसल गुंटूर में दुसरे राज्यों से आने वाली लालमिर्च की क्वालिटी की गहन जांच-पड़ताल की जाती है। संयोग से स्वयं गुंटूर मंडी में ही स्थानीय उत्पादन का भारी भरकम स्टॉक मौजूद है। पिछले सीजन में उत्पादित लालमिर्च का स्टॉक भी शीत ग्रहों (कोल्ड स्टोरेज) में पड़ा हुआ है।
हालांकि फिरोजपुर की लालमिर्च कीटनाशी अवशेष से मुक्त पायी जा रही हैं और गहरे लाल रंग के कारण गुंटूर के व्यापारी इसका ऊंचा मूल्य देने के लिए तैयार भी रहते हैं लेकिन इस बार वहां इसकी खरीद नहीं हुई और इसलिए उत्पादकों के स्थानीय व्यापारियों तथा राजस्थानी ग्राइंडर्स को 75-80 रुपए प्रति किल की डर से अपना उत्पाद बेचने के लिए विवश होना पड़ा।
