तुवर का भविष्य
31-May-2025 11:18 AM
खरीफ सीजन की सबसे प्रमुख दलहन फसल- अरहर (तुवर) की बिजाई का समय अत्यन्त निकट आ गया है और इसके बिजाई क्षेत्र तथा उत्पादन के बारे में तरह-तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैं। एक वर्ग 2025-26 सीजन के लिए इसमें बढ़ोत्तरी होने की उम्मीद व्यक्त कर रहा है
क्योंकि सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य को 7550 रुपए प्रति क्विंटल से 450 रुपए बढ़ाकर 8000 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित कर दिया है और इस मूल्य स्तर पर किसानों से शत-प्रतिशत अधिशेष स्टॉक की खरीद करने की घोषणा की है।
इसके अलावा इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून की अच्छी बारिश होने की संभावना भी है जिसके स्पष्ट शुरूआती संकेत मिल रहे हैं। दोनों शीर्ष उत्पादक राज्यों- महाराष्ट्र एवं कर्नाटक के विभिन्न भागों में मानसून की जोरदार बारिश हो रही है और अब मध्य प्रदेश, गुजरात, तेलंगाना तथा आंध्र प्रदेश में भी तुवर की बिजाई के लिए मौसम अनुकूल हो गया है।
इस बार किसानों का उत्साह एवं आकर्षण ही इसका निर्धारण करेगा कि तुवर के बिजाई क्षेत्र में बढ़ोत्तरी होती है या गिरावट आती है। 2024-25 के मार्केटिंग सीजन में तुवर का थोक मंडी भाव घटकर न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे आते ही सरकार ने इसकी जोरदार खरीद शुरू कर दी और देखते ही देखते इसकी मात्रा बढ़कर 5.60 लाख टन से ऊपर पहुंच गई।
इससे प्रमुख उत्पादक राज्यों में किसानों को राहत मिली है। अरहर का बिजाई क्षेत्र 2023-24 सीजन के 41 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 2024-25 के खरीफ सीजन में 43 लाख टन पर पहुंचा।
केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने तुवर का उत्पादन इस अवधि में 34.20 लाख टन से 1.40 लाख टन बढ़कर 35.60 लाख टन पर पहुंचने का अनुमान लगाया है जबकि उद्योग- व्यापार क्षेत्र का अनुमान इससे ऊंचा 37-38 लाख टन का है।
2025-26 के सीजन में तुवर का घरेलू उत्पादन और भी बढ़कर 40 लाख टन तक पहुंच जाने की उम्मीद व्यक्त की जा रही है। किसानों को अच्छी क्वालिटी एवं उच्च उपज दर वाली तुवर का बीज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करवाया जा रहा है।
आमतौर पर महाराष्ट्र सहित देश के अन्य राज्यों में मध्य जून से तुवर की बिजाई आरंभ होती है जबकि कर्नाटक में बिजाई कुछ पहले शुरू हो जाती है।
लेकिन वहां लगातार हो रही वर्षा से खेतों में पानी जमा होने अथवा नमी का अंश जरूरत से ज्यादा बढ़ जाने के कारण किसानों को बिजाई की प्रक्रिया शुरू करने में कठिनाई हो रही है।
मोटे तौर पर माना जा रहा है कि तुवर का उत्पादन क्षेत्र पिछले साल के लगभग बराबर रहेगा लेकिन अनुकूल मौसम से उपज दर बढ़ने पर कुल पैदावार बेहतर हो सकती है।
किसानों के लिए एक सेटबैक यह है कि सरकार ने तुवर के शुल्क मुक्त आयात की अवधि 31 मार्च 2026 तक बढ़ा दी है। इसके फलस्वरूप म्यांमार एवं अफ्रीकी देशों से इसके भारी-भरकम आयात का प्रवाह जारी रहेगा और स्वदेशी तुवर की कीमतों पर दबाव बन सकता है।
पिछले दो साल तक तुवर का भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य से काफी ऊंचा रहने के कारण किसानों को आकर्षक आमदनी प्राप्त हुई लेकिन इस बार परिदृश्य बदल गया। तुवर के बिजाई क्षेत्र और उत्पादन में अप्रत्याशित इजाफा होना मुश्किल लगता है।
किसानों को मक्का और गन्ना की खेती पर तुवर से ज्यादा लाभ मिल रहा है इसलिए उसकी बिजाई की नीति में कुछ बदलाव हो जाए तो कोई हैरानी की बात नहीं होगी।
