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07-Oct-2026 02:59 PM
नई दिल्ली। मौसम एवं मानसून की हालत पूरी तरह अनुकूल नहीं होने से खरीफ कालीन दलहन फसलों के उत्पादन में गिरावट आने की संभावना है जबकि रबी सीजन के दलहनों की बिजाई में बाधा पड़ने की आशंका है। घरेलू दाल-दलहन बाजार पर इसका सकारात्मक मनोवैज्ञानिक असर पड़ रहा है। त्यौहारी सीजन होने से चना एवं मटर की मांग बढ़ रही है जिससे कीमतों में तेजी-मजबूती बरकरार है। विदेशों से इसका आयात भी कम हो रहा है।
भारत में तुवर एवं उड़द का आयात 31 मार्च 2027 तक के लिए शुल्क मुक्त है और मूंग के आयात पर प्रतिबंध लगा हुआ है। दूसरी ओर देसी चना एवं मसूर पर 10-10 प्रतिशत तथा पीली मटर पर 30 प्रतिशत का आयात शुल्क लगा हुआ है।
उद्योग-व्यापार क्षेत्र में चर्चा हो रही है कि क्या सरकार दलहनों पर लगे आयात शुल्क को कम या खत्म करके देश में इसकी आपूर्ति एवं उपलब्धता बढ़ाने तथा कीमतों में तेजी पर अंकुश लगाने का प्रयास कर सकती है। एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या सीमा शुल्क की समाप्ति से भारत में सस्ते दलहनों का पर्याप्त आयात संभव हो पाएगा। ध्यान देने की बात है कि चना और मसूर पर केवल 10-10 प्रतिशत का ही मौलिक आयात शुल्क लगा हुआ है।
चना, मसूर, तुवर, मूंग एवं मटर जैसे प्रमुख दलहनों के दाम में हाल के सप्ताहों में 10 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। प्रमुख उत्पादक राज्यों में तुवर, उड़द एवं मूंग की फसल पर खतरा बना हुआ है। इसी तरह दलहनों की वैश्विक आपूर्ति की स्थिति जटिल बनी हुई है और डॉलर की तुलना में रुपया का मूल्य लगातार घटता जा रहा है। अभी त्यौहारी सीजन की मांग भी बनी हुई है।
पिछले एक माह के अंदर चना के थोक मूल्य में करीब 11 प्रतिशत का इजाफा हो गया। इसी तरह तुवर के दाम में 65 प्रतिशत, मूंग के मूल्य में 10.6 प्रतिशत और मटर के भाव में 6 प्रतिशत का इजाफा हो गया। महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं तेलंगाना जैसे सूखा ग्रस्त राज्यों में दलहनों का उत्पादन घटने की संभावना है। रूस तथा यूक्रेन से पीली मटर के निर्यात में भारी बाधा पड़ रही है जिससे वैश्विक बाजार में इसकी आपूर्ति घटने की संभावना है। इससे कनाडा को अपनी मटर का दाम बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। भारत में रुपए के अवमूल्यन तथा 30 प्रतिशत के ऊंचे सीमा शुल्क के साथ पीली मटर का आयात काफी महंगा बैठेगा।