दलहनों में आत्मनिर्भरता के लिए उपज दर में बढ़ोत्तरी की आवश्यकता
12-Feb-2025 06:11 PM
नई दिल्ली । हालांकि केन्द्रीय आम बजट में दलहन एवं तिलहन फसलों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने पर जोर दिया गया है लेकिन यह बहुत मुश्किल चुनौती है और इसका सफलतापूर्वक सामना करने के लिए नियमित तथा निश्चित रूप से गंभीर प्रयास करने की जरूरत है।
पिछले कुछ वर्षों से खाद्य तेलों के साथ-साथ दलहनों का होने वाला विशाल आयात गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। घरेलू मांग एवं जरूरत को पूरा करने के लिए सरकार को दलहनों के आयात को प्रोत्साहित करने के लिए विवश होना पड़ रहा है।
दलहनों का घरेलू उत्पादन बढ़ाने का दो आधार है- बिजाई क्षेत्र में बढ़ोत्तरी तथा उपज दर में इजाफा। दलहनों के क्षेत्रफल में वृद्धि की सीमित गुंजाइश है क्योंकि उससे अन्य फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
इसे देखते हुए दूसरे विकल्प यानी उपज दर में वृद्धि पर विशेष जोर देना पड़ेगा क्योंकि उससे पैदावार के साथ-साथ किसानों की आमदनी बढ़ाने में भी सहायता मिलेगी।
दलहनों के अग्रणी उत्पादक एवं निर्यातक देशों में उपज दर भारत से काफी ऊंची रहती है। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मसूर की औसत उपज दर चीन की तुलना में 65 प्रतिशत नीचे रहती है।
चीन में मसूर की उपज दर दुनिया में सबसे ऊंची मानी जाती है। 2022-23 सीजन के दौरान भारत में मसूर की औसत उपज दर महज 899 किलो प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई जबकि चीन में यह 2570 किलो प्रति हेक्टेयर रही थी।
इसी तरह वर्ष 2022 में इथोपिया में चना की औसत उपज दर सबसे ऊंची 2170 किलो प्रति हेक्टेयर रही थी जबकि भारत में 2022-23 सीजन के दौरान केवल 1261 किलो प्रति हेक्टेयर यानी करीब 42 प्रतिशत कम रही।
भारत बेशक दुनिया में दलहनों का सबसे प्रमुख उत्पादक देश है मगर यह उपलब्धि सिर्फ बिजाई क्षेत्र पर आधारित है।
यदि इसके अनुरूप उपज दर में इजाफा हो जाए तो भारत दलहनों के आयातक से निर्यातक देश बन सकता है।दलहनों की घरेलू मांग तेजी से बढ़ रही है इसलिए उपज दर को भी उसी रफ्तार से बढ़ाना आवश्यक है।
