फाइबर की कुल खपत में रूई की भागीदारी घटने के संकेत
05-Dec-2024 06:15 PM
मुम्बई । विश्व स्तर पर और साथ ही साथ भारत में भी फाइबर के कुल उपयोग में रूई की भागीदारी घटती जा रही है जबकि सिंथेटिक एवं सेल्यूलोसिक फाइबर का उत्पादन एवं इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है।
भारतीय फैशन उद्योग ने भी वैश्विक ट्रेंड को अपनाना शुरू कर दिया है और इसलिए यहां अधिकांश टेक्सटाइल उत्पादों में विभिन्न तरह के फाइबर का प्रयोग होने लगा है।
ब्लेंड्स और खासकर ट्राई-ब्लेंड्स का इस्तेमाल फैशन की दुनिया में लगातार प्रचलित एवं लोकप्रिय हो रहा है। यह न केवल उच्च फैशन उत्पादों में इस्तेमाल हो रहा है बल्कि रिटेल वैल्यू चेन में भी प्रयुक्त हो रहा है क्योंकि इसका क्रियाशील पहलू बेहतर होता है। वैश्विक स्तर पर इन वस्त्र उत्पादों की अच्छी मांग बनी हुई है।
सॉदर्न इंडिया मिल्स एसोसिएशन (सीमा) के महासचिव का कहना है कि निस्संदेह विश्व स्तर पर मनुष्य द्वारा निर्मित रेशा (फाइबर) की मांग एवं खपत बढ़ गई है लेकिन गुणवत्ता नियंत्रण आदेश के कारण इसका आयात घट गया है।
इसके परिणामस्वरूप भारत में विदेशों से मनुष्य निर्मित (मैनमेड) फाइबर के आयात में कमी देखी जा रही है। मैनेमड फाइबर के बढ़ते प्रचलन से रूई की खपत पर पहले से ही असर पड़ रहा है। अब पुनर्चक्रीय (रिसाइकिल्ड) यार्न का उपयोग भी सुधरने लगा है।
भारत कपास के अग्रणी उत्पादक, उपयोगकर्ता एवं निर्यातक देशों की सूची में शामिल है और इसलिए अगर सिंथेटिक यार्न अथवा फाइबर के उपयोग में जोरदार इजाफा हुआ तो रूई की मांग स्वाभाविक रूप से काफी घट जाएगी। कोरोना के समय से ही सिंथेटिक फाइबर का उपयोग बढ़ना शुरू हो गया था।
अमरीकी कृषि विभाग की रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 सीजन के दौरान 1152 लाख गांठ (226.8 किलो की प्रत्येक गांठ) रूई की वैश्विक खपत होने का अनुमान है जो दस वर्षीय औसत के लगभग बराबर है लेकिन 4 वर्ष पूर्व की रिकॉर्ड खपत से करीब 9 लाख गांठ कम है। वर्ष 2023 के दौरान फाइबर का वैश्विक उपयोग उछलकर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा था।
