जीएम फसलों पर भारत में असमंजस की स्थिति बरकरार

18-Aug-2025 04:10 PM

नई दिल्ली। भारत में वर्ष 2002 में बीटी कॉटन की व्यापारिक खेती की अनुमति दी गति थी और उसके बाद किसी अन्य जीएम फसल के उत्पादन की स्वीकृति नहीं दी गई है।

कपास को मुख्यतः एक औद्योगिक फसल माना जाता है इसलिए इसकी मंजूरी दिए जाने पर देश में कोई बड़ा हंगामा नहीं हुआ मगर जब खाद्य फसलों को मंजूरी देने का मामला सामने आया तब चारो तरफ इसका विरोध शुरू हो गया।

इसके फलस्वरूप भारत में अब भी बीटी कॉटन को छोड़कर अन्य सभी जीएम फसलों के उत्पादन, आयात, कारोबार एवं उपयोग पर प्रतिबंध लगा हुआ है। 

अब अमरीका भारत पर जीएम उत्पादों और खासकर सोयाबीन एवं मक्का के लिए अपना बाजार खोलने हेतु दबाव डाल रहा है जबकि भारत इससे साफ इंकार कर रहा है।

भारतीय हरित क्रांति के शिल्पकार एमएस स्वामीनाथन ने देश में खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ाने के लिए अत्यंत ठोस रणनीति बनाई थी और उस पर गंभीरता से अमल करके भारत अनाज के उत्पादन में आत्मनिर्भर भी हो गया। लेकिन उस समय जीएम फसलों का प्रचलन नहीं था और इसलिए इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया। 

बेशक भारत आज संसार में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक और दूसरा सबसे प्रमुख उत्पादक देश बना हुआ है। इसी तरह गेहूं के उत्पादन में भी पूरी तरह आत्मनिर्भर है मगर दलहन-तिलहन की पैदावार घरेलू जरूरत से कम होती है और इसलिए विदेशों से विशाल मात्रा में खाद्य तेलों तथा दलहनों  का आयात करना पड़ता है जिस पर भारी-भरकम बहुमूल्य विदेशी मुद्रा खर्च होती है।

मोटे अनाजों में भी देश काफी हद तक आत्मनिर्भर है लेकिन एथनॉल निर्माण में मक्का के तेजी से बढ़ते उपयोग को देखते हुए आगामी वर्षों में यदि घरेलू उत्पादन में अपेक्षित बढ़ोत्तरी नहीं हुई तो विदेशों से इसके भारी आयात की आवश्यकता पड़ सकती है।

नीति आयोग ने अमरीका से सिर्फ एथनॉल उत्पादन में इस्तेमाल के लिए मक्का के आयात की अनुमति देने का सुझाव दिया था मगर सरकारी नीति और दबाव के कारण इस सुझाव को वापस ले लिया।

भारत की आबादी तेजी से बढ़ती जा रही है और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने हेतु खाद्यान्न सहित अन्य फसलों का उत्पादन तेजी से बढ़ाने की आवश्यकता पड़ेगी।

सरकार इस दिशा में हर संभव प्रयास कर रही है। दलहन-तिलहन फसलों का घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता को घटाया जा सकता है लेकिन इसके लिए जीएम प्रजातियों का इस्तेमाल होना चाहिए या नहीं - इस मुद्दे पर असमंजस का माहौल बरकरार है।