जलवायु परिवर्तन से बारिश में वृद्धि की संभावना
19-Mar-2025 04:10 PM
नई दिल्ली। केन्द्र सरकार ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन के कारण आगामी वर्षों के दौरान देश में ज्यादा बारिश हो सकती है जिससे मिटटी की उर्वरा शक्ति में कमी आने की आशंका रहेगी और क्षारीय गुण से प्रभावित क्षेत्रों का दायरा बढ़ सकता है। इसकी वजह से कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
केन्द्रीय कृषि मंत्री के अनुसार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने मृदा अपरदन, वर्षा की पद्धति तथा फसलों की उपज दर पर जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभाव का आंकलन करने के लिए एक विस्तृत अध्ययन किया है जिससे पता चलता है कि खरीफ कालीन वर्षा में वर्ष 2050 तक 4.9 से 10.1 प्रतिशत तथा वर्ष 2080 तक 5.5 से 18.9 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है।
मालूम हो कि खरीफ सीजन के दौरान देश में दक्षिण- पश्चिम मानसून सक्रिय रहता है और करीब 70 प्रतिशत वर्षा इसी सीजन में होती है।
कृषि मंत्री के मुताबिक आईसीएआर की रिपोर्ट से यह भी खुलासा हुआ है कि रबी कालीन वर्षा में वर्ष 2050 तक 12 से 17 प्रतिशत तथा वर्ष 2080 तक 13 से 26 प्रतिशत तक का इजाफा हो सकता है।
कृषि मंत्री के मुताबिक वर्षा में होने वाली यह भारी वृद्धि कृषि फसलों के उत्पादन की दृष्टि से नुकसानदायक साबित हो सकती है।
इसके फलस्वरूप वर्ष 2050 तक कृषि योग्य भूमि से प्रत्येक साल 10 टन प्रति हेक्टेयर के समतुल्य मिटटी का नुकसान हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन के आलोक में खारे पानी से प्रभावित क्षेत्र का दायरा भी वर्तमान समय के 67 लाख हेक्टेयर से बढ़कर वर्ष 2030 तक 110 लाख हेक्टेयर पर पहुंच जाने की संभावना है। इससे कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
यदि सही समय पर आवश्यक एहतियाती उपायों के लिए सही कदम नहीं उठाए गए तो जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा पर आश्रित क्षेत्र में चावल की औसत उपज दर में वर्ष 2050 तक 20 प्रतिशत एवं 2080 तक 10 से 47 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आ सकती है।
इसी तरह सिंचाई सुविधा वाले इलाकों में भी इस अवधि के दौरान क्रमश: 3.5 प्रतिशत एवं 5 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है।
इसके अलावा गेहूं की औसत उपज दर में भी वर्ष 2050 तक 19.3 प्रतिशत तथा वर्ष 2080 तक 40 प्रतिशत की जोरदार गिरावट आने की आशंका व्यक्त की गई है।
इसी तरह खरीफ कालीन मक्का की उत्पादकता में वर्ष 2050 तक 10 से 19 प्रतिशत तक तथा वर्ष 2080 तक 20 प्रतिशत से अधिक की कमी आने की संभावना है। इससे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
