कृषि क्षेत्र में प्रगति की निरंतरता जारी रखने की आवश्यकता

07-Jan-2026 08:58 PM

नई दिल्ली। यद्यपि भारत के विशालकाय कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीक एवं विधियों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ने लगा है जिससे उत्पादन में क्रमिक रूप से बढ़ोत्तरी भी हो रही है लेकिन विकास की निरंतरता को बरकरार रखने के लिए आगे और गंभीर प्रयास की जरूरत पड़ेगी। केन्द्रीय कृषि मंत्रालय विभिन्न राज्यों के कृषि विभागों के साथ मिलकर इस दिशा में यथोचित कोशिश कर रहा है।

धान (चावल) और गेहूं के उत्पादन में भारत पहले ही आत्मनिर्भर हो चुका है और यहां श्री अन्न / मोटे अनाजों का उत्पादन भी घरेलू मांग एवं जरूरत को पूरा करने के लायक हो जाता है।

गन्ना की अच्छी पैदावार हो रही है जिससे चीनी के आयात की आवश्यकता नहीं पड़ती है। लेकिन दलहन-तिलहन का मामला इससे भिन्न है। कुछ हद तक कपास को भी इस श्रेणी में रखा जा सकता है। 

हालत यह है कि एक तरफ भारत दुनिया में चावल का सबसे प्रमुख निर्यातक देश बना हुआ है और समय-समय पर गेहूं, मक्का तथा चीनी आदि का शिपमेंट भी करता है

तो दूसरी ओर यह खाद्य तेलों एवं दलहनों का सबसे बड़ा आयातक भी बना हुआ है। इस विसंगति को दूर करना अत्यन्त आवश्यक है। 

ऐसा नहीं है कि भारत में दलहन-तिलहन फसलों की बिजाई सीमित क्षेत्रफल में होती है बल्कि यहां सोयाबीन, सरसों एवं मूंगफली जैसी तिलहन फसलों का रकबा अत्यन्त विशाल रहता है

लेकिन औसत उपज दर काफी नीचे होने के कारण अपेक्षित उत्पादन प्राप्त नहीं होता है। इसे बढ़ाए जाने की सख्त जरूरत है।