खाद्य महंगाई को नियंत्रित करने हेतु नीतिगत बदलाव की जरूरत पर जोर
09-Dec-2024 03:57 PM
नई दिल्ली । केन्द्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने खाद्य महंगाई को नियंत्रित करने तथा ऊंची ब्याज दरों का मुद्दा सुलझाने के लिए नीतिगत परिवर्तन की जरूरत पर जोर देते हुए कहा है कि यद्यपि वे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के निर्णयों में हस्तक्षेप करने के लिए प्राधिकृत नहीं हैं मगर वे सिर्फ मुख्य आर्थिक सलाहकार के विचारों को ही दोहरा रहे हैं। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि दलहनों एवं टमाटर जैसे उत्पादों की मांग को ब्याज दर कैसे प्रभावित कर सकती है ?
वाणिज्य मंत्री ने भारत की आर्थिक मजबूती के प्रति भरोसा जताते हुए कहा है कि दूसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर धीमी रही जिसका मुख्य कारण चुनाव से सम्बन्धित कारक थे।
यह अस्थायी घटना थी जो अब बीत चुकी है। अब देश के मैक्रोइकोनॉमिक फंडामेंटल्स को तेज किए जाने की आवश्यकता है।
मंत्री महोदय का कहना था कि भारत की अर्थ व्यवस्था तिमाही से तिमाही आधार पर संचालित नहीं होती है जैसा कि शेयर बाजार (स्टॉक मार्केट) में होता है। मैक्रो आंकड़ों से पता चलता है कि अर्थ व्यवस्था की आधारभूत ताकत स्थिर बनी हुई है। भारत आगे भी निरन्तर दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थ व्यवस्था वाला देश बना रहेगा।
पिछले अनेक महीनों से दाल-दलहनों एवं सब्जियों का भाव काफी ऊंचा एवं तेज चल रहा है। खाद्य महंगाई की दर भी ऊंची है। इसे देखते हुए रिजर्व बैंक ने हाल की अपनी मौद्रिक समीक्षा बैठक में ब्याज दर में कोई बदलाव नहीं करने का फैसला किया।
वैसे अर्थ शास्त्रियों का मानना है कि खाद्य महंगाई और ब्याज दर के बीच कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है लेकिन रिजर्व बैंक की धारणा इससे अलग प्रतीत होती है।
अक्सर यह आशंका व्यक्त की जाती है कि ब्याज दर कम रहने पर बड़े-बड़े प्रतिष्ठान, मिलर्स तथा स्टॉकिस्ट बैंको से भारी ऋण लेकर दलहनों का विशाल स्टॉक जमा कर सकते हैं जिससे घरेलू बाजार में इसकी आपूर्ति एवं उपलब्धता में कमी आने तथा कीमतों में बढ़ोत्तरी होने की संभावना बढ़ जाएगी।
दलहनों के साथ-साथ अन्य कृषि जिंसों के बारे में भी ऐसी ही आशंका रहती है। इसके फलस्वरूप रिजर्व बैंक को बाजार पर नजर रखना पड़ता है।
