खाद्य तेल उद्योग को सरकार से नीतिगत समर्थन की आवश्यकता
11-May-2026 07:24 PM
मुम्बई। पश्चिम एशिया में जारी संकट एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रचलित ऊंचे भाव के साथ खाद्य तेलों के शिपमेंट चार्ज एवं बीमा व्यय भी भारतीय उद्योग के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है। अमरीकी डॉलर की तुलना में भारतीय मुद्रा (रुपया) के काफी कमजोर पड़ जाने से भी कठिनाई बढ़ी है।
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सी) ने केन्द्रीय वित्त मंत्री, वाणिज्य मंत्री, कृषि मंत्री एवं खाद्य मंत्री को पत्र भेजकर और आंकड़ों का हवाला देकर खाद्य तेल उद्योग एवं व्यापार क्षेत्र की तमाम समस्याओं एवं चुनौतियों से अवगत करवाया है। पत्र में कहा गया है कि 27 फरवरी (ईरान अमरीका युद्ध से पहले) मुम्बई बंदरगाह पर आरबीडी पामोलीन का आयात खर्च 1115 डॉलर प्रति टन बैठ रहा था जो सीज फायर के बाद 7 मई तक आते-आते 120 डॉलर उछलकर 1235 डॉलर प्रति टन हो गया।
इसी तरह समान अवधि में क्रूड पाम तेल (सीपीओ) का आयात खर्च 1150 डॉलर प्रति टन से 105 डॉलर बढ़कर 1255 डॉलर प्रति टन तथा क्रूड सोयाबीन तेल का आयात खर्च 1230 डॉलर प्रति टन से 80 डॉलर बढ़कर 1310 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गया जबकि क्रूड सूरजमुखी तेल का आयात खर्च 1400 डॉलर प्रति टन के ऊंचे स्तर पर बरकरार रहा।
'सी' के अनुसार समीक्षाधीन अवधि के दौरान विभिन्न आपूर्तिकर्ता देशों से भारत के कांडला एवं मूंदड़ा बंदरगाहों पर खाद्य तेलों के आयात का शिपमेंट खर्च एवं बीमा व्यय भी बढ़ गया। अर्जेन्टीना से शिपमेंट खर्च पहले 70/75 डॉलर था जो अब बढ़कर 140/145 डॉलर हो गया है।
बीमा खर्च भी 15 डॉलर से सुधरकर 20 डॉलर हो गया है। इसी तरह रूस से शिपमेंट खर्च 55 डॉलर से बढ़कर 90/95 डॉलर तथा बीमा खर्च 15 डॉलर से सुधरकर 20/25 डॉलर हो गया है। इंडोनेशिया / मलेशिया से आयात (शिपमेंट) खर्च 40 डॉलर से बढ़कर 55 डॉलर हो गया है जबकि बीमा खर्च में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
ऐसी स्थिति में स्वदेशी वनस्पति तेल उद्योग को सरकार के नीतिगत सहयोग- समर्थन एवं प्रोत्साहन की सख्त आवश्यकता है अन्यथा खाद्य तेलों का घरेलू बाजार भाव तेजी से बढ़ सकता है।
