महाराष्ट्र में खरीफ फसलों को अनुमान से कम क्षति होने का दावा

22-Aug-2025 11:48 AM

मुम्बई। उद्योग-व्यापार एवं कृषि क्षेत्र के कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि बेशक प्राकृतिक आपदाओं के प्रकोप से महाराष्ट्र में खरीफ फसलों को नुकसान हुआ है मगर इसका आंकड़ा इतना बड़ा नहीं है जिसका अनुमान लगाया जा रहा है।

इसी तरह फसलों की हालत भी उतनी खराब नहीं है जितनी सूचना दी जा रही है। पिछले सप्ताह में ही महाराष्ट्र के विभिन्न भागों में लगातार होने वाली मूसलाधार वर्षा से खेतों में पानी भर जाने के कारण खरीफ फसलों को काफी क्षति होने की आशंका व्यक्त की जा रही है।

किसानों द्वारा इस नुकसान की सूचना कृषि विभाग को नियमित रूप से दी जा रही है। हालांकि इस नुकसान के दायरे का अभी आंकलन-मूल्यांकन किया जा रहा है मगर राज्य के कई भागों में क्षति कम होने के संकेत मिल रहे हैं। 

कुछ समय तक सुस्त रहने के बाद दक्षिण-पश्चिम मानसून 14 अगस्त से महाराष्ट्र में पुनः सक्रिय हो गया। इसके बाद वहां अगले तीन-चार दिनों तक भारी वर्षा होती रही जिससे निचले इलाकों के खेतों में फसलें जल मग्न हो गई।

ध्यान देने की बात है कि वहां कोंकण तट के आसपास मजबूत सीजन के आरंभ से ही भारी वर्षा होती रही मगर मराठवाड़ा, मध्य महाराष्ट्र एवं विदर्भ संभाग में वर्षा सामान्य औसत से कम हुई।

मौसम विभाग के आंकड़ों से ज्ञात होता है कि 13 अगस्त तक सामान्य औसत की तुलना में विदर्भ संभाग में 6 प्रतिशत, सेन्ट्रल महाराष्ट्र में 7 प्रतिशत एवं मराठवाड़ा संभाग में 23 प्रतिशत कम बारिश हुई थी। कई क्षेत्रों में वर्षा की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। 14 अगस्त से बारिश का दौर शुरू हो गया। 

इस बारिश की वजह से न केवल तीनों संभागों में वर्षा की कमी पूरी हो गई बल्कि कुछ इलाकों में जरूरत से ज्यादा बरसात होने तथा बाढ़ का परिदृश्य उत्पन्न होने से खेतों में खड़ी खरीफ फसलों को नुकसान भी हुआ।

मौसम विभाग के मुताबिक 1 जून से 20 अगस्त के दौरान समूचे राज्य में 775.40 मि०मी० वर्षा हुई जो सामान्य औसत बारिश 724.10 मि०मी० से 7 प्रतिशत अधिक रही। तीनों संभागों में वर्ष सामान्य औसत से 5-7 प्रतिशत ऊपर पहुंच गई। 

इस मूसलाधार वर्षा से कुछ इलाकों में खरीफ फसलों को नुकसान हुआ मगर मीडिया रिपोर्ट में जितनी क्षति बताई गई है उतनी शायद नहीं हुई है। नुकसान का वास्तविक आंकड़ा सर्वेक्षण के बाद ही सामने  आएगा।

वर्षा का दौर थमने से खेतों से पानी की निकासी तेजी से होने लगी है। लेकिन फिर भी दलहन, तिलहन और कपास की फसल को कुछ नुकसान तो हो ही गया।