News Capsule/न्यूज कैप्सूल कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में दलहनों के उत्पादन आंकड़ों पर मतभेद गहराए, भारत के लिए बड़ा संकेत
01-Oct-2025 01:00 PM
कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में दलहनों के उत्पादन आंकड़ों पर मतभेद गहराए, भारत के लिए बड़ा संकेत
★ हर साल की तरह इस बार भी कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में दलहनों के उत्पादन को लेकर सरकारी और निजी एजेंसियों के बीच आंकड़ों में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। यह कोई नई बात नहीं है — अक्सर देखा गया है कि शुरुआती अनुमान कम रखे जाते हैं और फिर मौसम व उत्पादन परिस्थितियों के बेहतर होने के बाद इन्हें धीरे-धीरे बढ़ा दिया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि भारत में इसका ठीक उल्टा होता है, जहां सरकारी एजेंसियां अक्सर व्यापारिक अनुमानों की तुलना में अधिक उत्पादन के आंकड़े पेश करती हैं।
★ ऑस्ट्रेलिया: चना और मसूर पर दो तरह की तस्वीर
★ ऑस्ट्रेलिया की सरकारी एजेंसी ABARES ने 2025 सीजन के लिए 21 लाख टन चना और रिकॉर्ड 17 लाख टन मसूर उत्पादन का अनुमान जारी किया है।
★ हालांकि, निजी और व्यापारिक विशेषज्ञ इससे असहमत हैं। उनका मानना है कि चने का उत्पादन 23 से 25 लाख टन के बीच रह सकता है, जबकि मसूर का उत्पादन 18 लाख टन से अधिक होने की संभावना है।
★ पिछले सीजन में भी यही पैटर्न देखा गया था, शुरुआत में 18 लाख टन चना का अनुमान जारी किया गया था, जो बाद में बढ़ाकर 22.67 लाख टन तक पहुंच गया। मसूर में भी इसी तरह अनुमान बाद में संशोधित किए गए थे।
~~~~~~~~~
कनाडा: मटर और मसूर पर आंकड़ों का खेल
★ कनाडा की सरकारी एजेंसी STATSCAN ने 2025 के लिए मटर उत्पादन 35.6 लाख टन और मसूर उत्पादन 29.72 लाख टन आंका है।
वहीं, एक प्रमुख निजी एजेंसी का अनुमान इससे कहीं अधिक है, उनके अनुसार बेहतर उत्पादकता के चलते मटर का उत्पादन 37.5 लाख टन और मसूर का 36 लाख टन तक पहुंच सकता है।
★ हमारा मानना है कि इन देशों में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में स्थिरता बनाए रखने और किसानों को प्रोत्साहित रखने के लिए शुरुआती आंकड़े कम रखे जाते हैं। यदि शुरुआत में ही उत्पादन ज्यादा दिखा दिया जाए, तो बाजार में कीमतें गिर सकती हैं और किसानों को फसलों के उचित दाम नहीं मिल पाएंगे।
★ इसके विपरीत भारत में अक्सर सरकारी अनुमान वास्तविक उत्पादन से अधिक दिए जाते हैं, जिससे घरेलू बाजार में दामों पर दबाव आता है और किसानों व व्यापारियों दोनों को नुकसान होता है।
~~~~~~~~~
★ भारत एक बड़ा आयातक देश है। ऐसे में इन देशों की आंकड़ा नीतियों को समझना बेहद जरूरी है।
यदि भारत विदेशी अनुमानों पर सीधे भरोसा करता रहा, तो यह व्यापारिक रणनीतियों और कीमत निर्धारण पर प्रतिकूल असर डाल सकता है।
