रूई उत्पादों की बढ़ती वैश्विक मांग से भारत में कपास उत्पादन को मिलेगा प्रोत्साहन
30-Sep-2025 05:55 PM
कोयम्बटूर।अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अब पुनः परम्परागत रेशे (कपास) वाले उत्पादों की मांग एवं खपत में बढ़ोत्तरी होने के संकेत मिल रहे हैं जो भारतीय कपास क्षेत्र के लिए अच्छी खपर है।
इंडियन कॉटन फेडरेशन (आईसीएफ) का कहना है कि प्राकृतिक एवं सस्टेनेबल फाइबर की तरफ विश्व स्तर पर ग्राहकों का रुझान बढ़ रहा है।
इससे भारत के कॉटन उद्योग को विभिन्न उत्पादों का उत्पादन एवं निर्यात बढ़ने का अच्छा अवसर प्राप्त होने की उम्मीद है। इसके फलस्वरूप देश में कपास के उत्पादन को अच्छा सहयोग- समर्थन एवं प्रोत्साहन मिल सकता है।
फेडरेशन के पुनः निर्वाचित अध्यक्ष ने 46 वीं वार्षिक आम बैठक में कहा कि अनेक देशों में ग्राहकों एवं ब्रांडों का आकर्षण सिंथेटिक वस्त्रों से हटकर अब इको फ्रेंडली विकल्पों यानी कॉटन की तरफ बढ़ने लगा है।
कपास (रूई) से निर्मित सिले सिलाए वस्त्रों की मांग में अच्छी वृद्धि के संकेत मिल रहे हैं। आईसीएफ अंतर्राष्ट्रीय भारतीय कॉटन उत्पादों की पोजीशन को मजबूत करने की दिशा में लगातार सकारात्मक प्रयास करता रहेगा क्योंकि कपास उत्पादों का चुनाव और उपयोग करने का बेहतर समय आगे आने वाला है।
फेडरेशन के अध्यक्ष के अनुसार 2025-26 के सीजन में देश भर में करीब 120 लाख हेक्टेयर में कपास की खेती से 320-325 लाख गांठ रूई का उत्पादन होने का अनुमान है।
भारत सरकार ने कपास अनुसंधान के लिए 2500 करोड़ रुपए के आवंटन का प्रस्ताव रखा है जिससे आगामी वर्षों के दौरान कपास की औसत उपज दर दोगुना बढ़ाने में सहायता मिलेगी।
अनुसंधान, तकनीक तथा क्रियान्वयन के साथ देश में 500 लाख गांठ तक कपास का वार्षिक उत्पादन पहुंचाना संभव हो सकता है। यदि यह महत्वाकांक्षी उत्पादन लक्ष्य हासिल हो गया तो वस्त्र उत्पादों के वैश्विक निर्यात बाजार पर भारत का वर्चस्व स्थापित हो सकता है।
देश में उच्च क्वालिटी के लम्बे रेशेवाली कपास का उत्पादन बढ़ाना पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि अखिल भारतीय स्तर पर कपास का बिजाई क्षेत्र इस वर्ष 26 सितम्बर तक 110 लाख हेक्टेयर पर ही पहुंच सका जो पिछले साल की समान अवधि के क्षेत्रफल 113 लाख हेक्टेयर से 3 लाख हेक्टेयर कम है।
