सोयाबीन बाजारों के बिगड़ते हाल; सरकार को तुरंत संज्ञान लेना चाहिए

09-Dec-2024 04:00 PM

सोयाबीन बाजारों के बिगड़ते हाल; सरकार को तुरंत संज्ञान लेना चाहिए
सोयाबीन बाजार में गंभीर गिरावट आ चुकी है, और अगर यह गिरावट एक महीने तक जारी रही, तो कई व्यापारी, प्रोसेसर्स, प्लांट्स, और एक्सट्रैक्टर्स के व्यापार पर ताला लग सकता है। इस समय कई किसानों और व्यापारियों के पास 2-3 सालों का स्टॉक पड़ा हुआ है। यदि यह स्थिति बनी रही, तो आगामी सीजन में सोयाबीन की बुआई पर भी बुरा असर पड़ेगा।
क्रशिंग मार्जिन कम होने के कारण प्लांटों ने सोयाबीन की खरीदी रोक दी है। वर्तमान में सोयाबीन की कीमतें पिछले दो सीज़न के न्यूनतम स्तर पर हैं।
मंदी के कारण:
1. अधिक उत्पादन से बाजार में सोयाबीन की उपलब्धता में इजाफा।
2. बाजार में पुराने स्टॉक का अधिक होना।
3. सोयामील की निर्यात मांग में कमी।
4.सोयामील के घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय भाव निम्न स्तर पर होना।
5. विदेशों से खाद्य तेलों का आयात बढ़ना।
6. विदेशों में सोयाबीन की अधिक उपलब्धता।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम:
1. खाद्य तेलों के आयात शुल्क में वृद्धि।
2.MSP पर सोयाबीन की खरीद।
3. खरीद के लिए नमी की मात्रा कम करना।
लेकिन इसके बावजूद सोयाबीन की कीमतें निम्न स्तर पर बनी हुई हैं, जिससे किसानों और व्यापारियों के लिए संकट गहरा रहा है।

सरकार को हस्तक्षेप करना होगा
अगर सरकार समय रहते हस्तक्षेप नहीं करती, तो यह स्थिति नेशनल आयल मिशन पर असर डाल सकती है और भारत का खाद्य तेल आयात पर निर्भरता और बढ़ सकती है।
बाज़ारों को संभालने के लिए सरकार को निम्नलिखित कदम उठाने पर विचार करना चाहिए:
1. रिफाइंड और क्रूड तेलों के आयात शुल्क में 20-25% का अंतर करना। 
2. सोयामील निर्यात पर इंसेंटिव देना।
3. प्रोसेसर्स, प्लांट्स और एक्सट्रैक्टर्स को आर्थिक सहायता  दे ताकि वे अपनी संचालन क्षमता बनाए रख सकें।
4. किसानों के हित में नई और पुरानी फसल की खरीद में भावांतर योजना लाना। 
5. विदेशी आयात पर मात्रात्मक प्रतिबंध लगाना।
6. वायदा बाजार को पुनः चालू करना जिससे एक्सचेंज में खरीद-फरोख्त हो सके और बाजार में स्थिरता बनी रहे।

निष्कर्ष:
इस समय सोयाबीन, तेल उद्योग और किसानों की वित्तीय स्थिति गंभीर है। सरकार को तत्काल इन कदमों को उठाकर बाजार को स्थिर करने की दिशा में कार्य करना चाहिए। अन्यथा, यह संकट और गहरा हो सकता है, जिससे भारत की खाद्य तेल सुरक्षा और कृषि क्षेत्र पर दूरगामी असर पड़ेगा।