सोयाबीन का भाव बढ़ने के लिए सरकारी खरीद में तेजी आना आवश्यक

19-Nov-2024 06:50 PM

इंदौर । तीनों शीर्ष उत्पादक प्रांतों- मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं राजस्थान के साथ-साथ कर्नाटक, तेलंगाना तथा गुजरात में भी सोयाबीन का भाव  सरकारी समर्थन मूल्य से काफी नीचे चल रहा है और खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में 20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी करने का सरकार का निर्णय भी इसके दाम को ऊंचा उठाने में कारगर साबित नहीं हो सका।

हालांकि प्रमुख उत्पादक राज्यों में 4892 रुपए प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर सोयाबीन खरीदने का अभियान आरंभ हो चुका है अगर इसकी खरीद की गति इतनी धीमी है कि मार्केट पर इसका कोई सकारात्मक असर नहीं पड़ रहा है।

ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार स्वाभाविक रूप से सोयाबीन बाजार के ऊपर उठने का इंतजार कर रही थी लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया है कि मिलर्स और व्यापारी ऊंचे दाम पर सोयाबीन खरीदने के लिए तैयार नहीं है तब सरकारी खरीद की गति कुछ तेज हो सकती है। 

यह माना जा रहा है कि महाराष्ट्र में 23 नवम्बर को विधानसभा चुनाव का परिणाम सामने आने के बाद जिस गठबंधन की सरकार बनेगी वह सोयाबीन किसानों की ऊंचा मूल्य दिलाने का प्रयास अवश्य करेगा।

प्रधानमंत्री पहले ही कह चुके हैं कि महायुति गठबंधन की सरकार बनने पर किसानों से 6000 रुपए प्रति क्विंटल की दर से सोयाबीन खरीदा जाएगा उधर महाविकास अघाड़ी भी सोयाबीन उत्पादकों की कठिनाइयों को दूर करने का हद संभव प्रयास करेगा। 

लेकिन मध्य प्रदेश एवं राजस्थान के लिए ऐसा कोई प्रयास होने में संदेह है क्योंकि वहां किसानों से ऊंचे दाम पर सोयाबीन खरीदने की घोषणा नहीं हुई है। मूल्य समर्थन योजना के तहत भी वहां अत्यन्त धीमी गति से सोयाबीन की खरीद होने की सूचना मिल रही है।

केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने सोयाबीन का घरेलू उत्पादन पिछले साल के 130.60 लाख टन से 3 लाख टन बढ़कर इस वर्ष 133.60 लाख टन पर पहुंचने का अनुमान लगाया है।

मंडियों में इसकी भारी आवक हो रही है। सोया तेल का दाम भी ऊंचा हो गया है मगर सोयाबीन की कीमतों में तेजी का माहौल नहीं देखा जा रहा है।

इसका प्लांट डिलीवरी मूल्य 4300-4400 रुपए प्रति क्विंटल पर ही अटका हुआ है जो न्यूनतम समर्थन मूल्य 4892 रुपए प्रति क्विंटल से काफी नीचे है। इससे किसानों को काफी नुकसान हो रहा है।