दाल- दलहनों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता के महत्वकांक्षी प्लान पर काम शुरू

11-Jun-2025 11:30 AM

नई दिल्ली। भारत में लगभग 300 लाख टन दलहनों की वार्षिक खपत होती है जबकि इसका घरेलू उत्पादन 250 लाख टन के आसपास होता है। इस तरह मांग और आपूर्ति के बीच करीब 50 लाख टन का अंतर रह जाता है जिसे पाटने के लिए कनाडा, म्यांमार, ऑस्ट्रेलिया, रूस एवं अफ्रीकी देशों से विशाल मात्रा में दलहनों के आयात की आवश्यकता पड़ती है। 

लेकिन अब भारत सरकार ने स्वदेशी स्रोतों से दलहनों का उत्पादन बढ़ाने तथा विदेशों से आयात पर निर्भरता घटाने के लिए एक महत्वकांक्षी प्लान पर काम शुरू कर दिया है। इससे कनाडा जैसे देशों को भारी कठिनाई हो सकती है। कनाडा से मसूर एवं पीली मटर का सर्वाधिक निर्यात भारत को ही किया जाता है। भारत ने संकेत दिया है कि निकट भविष्य में उसे दलहनों के आयात की आवश्यकता नहीं पड़ेगी क्योंकि वह इसमें आत्मनिर्भर बनने का प्रयास कर रहा है। केन्द्रीय वित्त मंत्री द्वारा पहले ही घोषणा की जा चुकी है कि भारत 2028-29 के सीजन तक दलहनों के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएगा। सरकार की इस योजना में नैफेड की भी अहम भूमिका होगी। उसे किसानों से मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के अंतर्गत तुवर, उड़द, मूंग, मसूर एवं चना की खरीद का दयित्व सौंपा जाता है। इस वर्ष नैफेड द्वारा किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर लगभग 6 लाख टन तुवर की खरीद की गई है। अन्य दलहनों की खरीद अपेक्षाकृत कम हुई है।

भारत अत्यन्त विशाल शाकाहारी देश है जहां अधिकांश लोग प्रोटीन की अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए दालों पर निर्भर रहते हैं। सरकार एक तरफ इसका बाजार भाव नियंत्रित करने का प्रयास करती है तो दूसरी ओर न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी बढ़ोत्तरी के साथ-साथ अन्य उपायों के जरिए किसानों को दलहनों का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित भी करती है। भारत में दलहनों के उत्पादन में अस्थिरता देखी जा रही है। कभी पैदावार काफी अच्छी होती है तो कभी कमजोर पड़ जाती है। इससे कीमतों में उतार-चढ़ाव का माहौल रहता है और बाजार में अनिश्चितता बनी रहती है। सरकार की दलहन आयात नीति से भी किसान अक्सर हतोत्साहित हो जाते हैं। दलहनों का शुल्क मुक्त आयात बंद होना आवश्यक है।