दलहन मिशन के समक्ष है कई गंभीर चुनौतियां
31-Dec-2025 03:30 PM
नई दिल्ली। सैद्धांतिक रूप से भारत दुनिया में दाल-दलहन का सबसे बड़ा उत्पादक देश बना हुआ है लेकिन हकीकत यह है कि यहां दलहनों का उत्पादन घरेलू मांग एवं जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होता है और इसलिए विदेशों से इसके विशाल आयात की आवश्यकता बनी रहती है।
सरकार ने दलहनों का उत्पादन बढ़ाने तथा आयात पर निर्भरता समाप्त करने के लिए 'दलहन मिशन' आरंभ किया है लेकिन इस मिशन को अपने लक्ष्य तक पहुंचने के रास्ते में अनेक कठिनाइयों एवं चुनौतियों से जूझना पड़ेगा।
बेशक सरकार प्रति वर्ष खरीफ और रबी सीजन में उत्पादित होने वाले पांच प्रमुख दलहनों- अरहर (तुवर), उड़द, मूंग, चना एवं मसूर के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में अच्छी बढ़ोत्तरी कर रही है
लेकिन दलहनों के उत्पादन संवर्धन के लिए इसे पर्याप्त नहीं माना जा रहा है। वैसे भी दलहनों की सरकारी खरीद सीमित मात्रा में होती है और समयावधि भी निश्चित रहती है जबकि मंडियों में सालों भर दलहनों की आवक जारी रहती है।
दलहन मिशन को एमएसपी से ऊपर देखना पड़ेगा। भारत में दलहनों की औसत उपज दर वैश्विक औसत से काफी नीचे रहती है इसलिए विशाल क्षेत्रफल में खेती होने के बावजूद इसका समुचित उत्पादन प्राप्त नहीं हो पाता है।
दूसरी ओर कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, रूस एवं म्यांमार जैसे देशों में कम क्षेत्रफल में बिजाई होने के बावजूद ऊंची उपज दर के कारण दलहनों का विशाल उत्पादन हो जाता है।
यदि भारत में उपज दर इन देशों के समक्ष पहुंच जाए तो दलहनों का कुल वार्षिक उत्पादन बढ़कर इतने ऊंचे स्तर पर पहुंच सकता है कि आयात की आवश्यकता तो समाप्त हो ही जाएगी- साथ ही साथ भारत से बड़े-पैमाने पर इसका निर्यात भी शुरू हो सकता है।
दलहन मिशन के अंतर्गत बिजाई क्षेत्र बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जाएगा। दो सीजन के बीच के खाली समय में दलहनों की खेती की जा सकती है और इसलिए ऐसे इलाकों की पहचान की गई है
जहां किसानों को खाली जमीन में दलहनों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। दलहन फसलें मौसम के प्रति काफी संवेदनशील होती है इसलिए किसानों को ठोस प्रोत्साहन दिया जाना आवश्यक है।
