भारत की कृषि नीति किस दिशा में जा रही है?
03-Dec-2025 12:34 PM
नई दिल्ली। आज भारत की कृषि मूल्य श्रृंखला पहले से कहीं अधिक बिखरी हुई और चिंतित दिखाई दे रही है, क्योंकि कई उद्योग एक साथ नीति हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। हाल ही में आयात शुल्क बढ़ाए जाने के बावजूद दलहन उद्योग अभी भी शुल्क और बढ़ाने की मांग कर रहा है, यह कहते हुए कि भारी विदेशी आयात घरेलू कीमतों को दबा रहे हैं।
खाद्य तेल उद्योग कच्चे और रिफाइंड दोनों तेलों पर आयात शुल्क बढ़ाने तथा तेल खल पर निर्यात प्रोत्साहन देने की मांग कर रहा है।
शुगर सेक्टर चीनी के MSP में वृद्धि चाहता है, जबकि मक्का और चीनी आधारित उद्योग एथनॉल खरीद मूल्य बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, ताकि उनकी उत्पादन लागत संतुलित रह सके। इसके उलट, पोल्ट्री उद्योग—जो ऊंची फीड लागत से जूझ रहा है—मक्का आयात की अनुमति मांग रहा है।
गेहूं उद्योग घरेलू मांग कमजोर रहने और स्टॉक बढ़ने के कारण कम से कम गेहूं उत्पादों के निर्यात खोलने की गुहार लगा रहा है।
वहीं, चावल उद्योग अत्यधिक स्टॉक से परेशान है और सरकार से किस प्रकार का राहत पैकेज मांगा जाए, इसको लेकर असमंजस में है।
दूसरी ओर कपास उद्योग घरेलू दामों को सहारा देने के लिए आयात रोकने की मांग कर रहा है।
ये विविध और कई बार एक-दूसरे के विपरीत मांगें इस बात का संकेत हैं कि कृषि मूल्य श्रृंखला गहरे तनाव से गुजर रही है। लगभग हर क्षेत्र सरकार से त्वरित हस्तक्षेप की अपेक्षा कर रहा है—कहीं उच्च MSP की मांग हो रही है, तो कहीं निर्यात में ढील, तो कहीं आयात प्रतिबंध और शुल्क संशोधन की मांग।
ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि जब लगभग हर कृषि क्षेत्र एक साथ सरकारी हस्तक्षेप की मांग कर रहा है—तो भारत की कृषि नीति वास्तव में किस दिशा में आगे बढ़ रही है?
