डीसीएस प्रणाली से फसलों के बिजाई क्षेत्र का सटीक अनुमान लगगने में सहायता
15-Nov-2024 04:36 PM
नई दिल्ली । 2024-25 के खरीफ सीजन में पहली बार फसलों के बिजाई क्षेत्र का सटीक आंकड़ा प्राप्त करने के लिए केन्द्र ने राज्य सरकारों के साथ मिलकर डिजिटल क्रॉप सर्वे (डीसीएस) सिस्टम का संचालन किया और इसका काफी उत्साहवर्धक परिणाम सामने आया। आगामी वर्षों के दौरान यह (डीसीएस) प्रणाली मौजूदा समय में प्रचलित मैनुअल 'गिरदावरी' सिस्टम को विस्थापित कर सकती है।
एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि डीसीएस सिस्टम भविष्य में फसलों के बिजाई क्षेत्र की बेहतर जानकारी हासिल करने की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है।
खरीफ सीजन में पहली बार इसका उपयोग प्रायोगिक तौर (पायलट बेसिस) पर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात तथा उड़ीसा में किया गया।
खरीफ 2024 के दौरान उपरोक्त राज्यों के सभी जिलों में डीसीएस सिस्टम के माध्यम से फसलों के उत्पादन क्षेत्र का सर्वेक्षण किया गया और इसके फलस्वरूप खासकर उत्तर प्रदेश में धान के उत्पादन क्षेत्र में काफी बढ़ोत्तरी पाई गई। पहले आंकड़ा छोटा मिल रहा था।
डीसीएस सिस्टम नए एवं आधुनिक भारत की कृषि व्यवस्था के लिए आवश्यक तथा महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अक्सर फसलों के बिजाई क्षेत्र की सटीकता पर सवाल खड़े होते रहे हैं।
सरकार विभिन्न फसलों के बिजाई क्षेत्र के आधार पर उसके उत्पादन का अनुमान लगाती है मगर क्षेत्रफल का आंकड़ा सही नहीं होता तब तक उत्पादन का आंकड़ा भी गलत होता रहेगा।
यही कारण है कि सरकार ने खरीफ सीजन के सबसे प्रमुख दलहन- तुवर का उत्पादन गत वर्ष की तुलना में सिर्फ करीब एक लाख टन बढ़कर 35 लाख टन पर पहुंचने का अनुमान लगाया है
जबकि मैनुअल गिरदावरी सिस्टम के अंतर्गत इसका कुल बिजाई क्षेत्र पिछले साल के 40.74 लाख हेक्टेयर से 5.81 लाख हेक्टेयर बढ़कर इस वर्ष खरीफ सीजन में 46.55 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया। इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून के सीजन में राष्ट्रीय स्तर पर बारिश भी काफी अच्छी हुई।
खरीफ कालीन फसलों का कुल उत्पादन क्षेत्र बढ़कर इस बार 11.10 करोड़ हेक्टेयर पर पहुंच गया जो पिछले साल से करीब 2 प्रतिशत ज्यादा तथा सामान्य औसत क्षेत्रफल से भी कुछ अधिक रहा।
देश के अधिकांश इलाकों में मानसून की अधिशेष बारिश हुई। मध्यवर्ती भाग में 19 प्रतिशत तथा दक्षिणी क्षेत्र में 14 प्रतिशत ज्यादा वर्षा हुई मगर उत्तरी एवं पूर्वोत्तर राज्यों में 14 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई।
