गेहूं एवं सरसों की वजह से चना के रकबे में ज्यादा वृद्धि की उम्मीद नहीं
28-Nov-2025 01:37 PM
नई दिल्ली। वर्तमान रबी सीजन के दौरान गेहूं और सरसों की खेती के बीच जोरदार प्रतिस्पर्धा रह सकती है क्योंकि गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 160 रुपए बढ़कर 2585 रुपए प्रति क्विंटल हो गया है जबकि सरसों का थोक मंडी भाव पिछले कई महीनों से काफी ऊंचे स्तर पर होने से किसानों को आकर्षक आमदनी प्राप्त हो रही है।
सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी बढ़ाया गया है। इससे इसकी खेती में किसानों का भारी उत्साह देखा जा रहा है।
पिछले साल की तुलना में चालू वर्ष के दौरान गेहूं तथा सरसों के क्षेत्रफल में अच्छी बढ़ोत्तरी होने की उम्मीद है जिससे चना की बिजाई पर असर पड़ने की आशंका है।
पहले चना के उत्पादन क्षेत्र में भी अच्छी बढ़ोत्तरी होने की उम्मीद की जा रही थी और फिलहाल इसका रकबा गत वर्ष से आगे चल रहा है लेकिन गेहूं और सरसों के बिजाई क्षेत्र में ज्यादा इजाफा होने पर चना के लिए अधिक स्कोप नहीं रहेगा क्योंकि अन्य रबी फसलों की खेती भी सामान्य ढंग से हो रही है।
इसे देखते हुए लगता है कि इस बार चना का घरेलू उत्पादन क्षेत्र या तो पिछले साल के लगभग बराबर रहेगा या इसमें कुछ इजाफा हो सकता है। गुजरात और राजस्थान में चना का रकबा बढ़ रहा है जबकि मध्य प्रदेश में घट रहा है।
मध्य प्रदेश में किसान इस बार चना के बजाए गेहूं और सरसों की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं क्योंकि एक तो राज्य में खेतों की मिटटी में नमी का पर्याप्त अंश मौजूद है और दूसरे,
गेहूं पर एक बार फिर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से ऊपर अतिरिक्त बोनस दिए जाने की संभावना है। इसके अलावा गेहूं फसल की सिंचाई के लिए बांधों-जलाशयों में पानी का भरपूर स्टॉक भी उपलब्ध है।
चना का प्रचलित घरेलू बाजार भाव किसानों के लिए ज्यादा उत्साहवर्धक नहीं है। ऑस्ट्रेलिया से आयातित चना का दाम भी एमएसपी से करीब 10 प्रतिशत नीचे है और आगे भी कीमतों में ज्यादा सुधार आना मुश्किल लगता है
क्योंकि ऑस्ट्रेलिया में एक बार फिर चना का शानदार उत्पादन होने के संकेत मिल रहे हैं। मध्य प्रदेश चना का सबसे प्रमुख उत्पादक राज्य माना जाता है।
वहां किसानों को चना के बजाए गेहूं, मक्का एवं सरसों से ज्यादा आकर्षक आमदनी प्राप्त हो रही है। कर्नाटक और महाराष्ट्र पर भी सबकी नजर लगी हुई है।
ज्ञात हो कि 2024-25 के पूरे रबी सीजन के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर चना का उत्पादन क्षेत्र कुछ घटकर 98.55 लाख हेक्टेयर पर अटक गया था जिससे इसके उत्पादन में कमी आ गई थी।
