गेहूं की कीमतें एमएसपी से नीचे, बाजार में दबाव बढ़ा; किसानों और उद्योग को राहत की जरूरत

03-Dec-2025 03:10 PM

गेहूं की कीमतें एमएसपी से नीचे, बाजार में दबाव बढ़ा; किसानों और उद्योग को राहत की जरूरत
नई दिल्ली। देश भर की कई मंडियों में गेहूं की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे चली गई हैं, जिससे कृषि बाजार में दबाव बढ़ गया है और किसानों के साथ साथ अब गेहूं उद्योग के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति बन गई है। रबी 2026–27 सीजन के लिए गेहूं का एमएसपी 2,585 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है, जबकि अधिकांश प्रमुख केंद्रों पर भाव इससे कम दर्ज किए गए हैं।

देशभर में भाव इस प्रकार रहे
विभिन्न मंडियों से मिली जानकारी के अनुसार, गेहूं के भाव इस प्रकार रहे—जबलपुर में 2,525 रुपये, कोटा (मिल क्वालिटी) में 2,480 रुपये, श्रीगंगानगर में 2,530 रुपये, गोरखपुर में 2,510 रुपये, मथुरा में 2,525 रुपये, जबकि राजकोट में 2,500 से 3,100 रुपये प्रति क्विंटल के बीच रहे। लंबे अंतराल के बाद यह पहली बार है जब बाजार में गेहूं की दरें एमएसपी से नीचे पहुंची हैं।
यह गिरावट मुख्य रूप से अच्छी उपलब्धता, कम दामों पर सरकारी बिक्री, गेहूं उत्पादों की कमजोर मांग और स्टॉक लिमिट के सख्त नियमों के कारण आई है।
कई किसानों को इस गिरावट का अभी तक पूर्ण अनुमान नहीं है, क्योंकि उन्होंने फसल का अधिकांश हिस्सा पहले ही बेच दिया था। इसके परिणामस्वरूप मंडियों में किसानों की बिक्री सीमित है। वहीं, पिछले दो वर्षों में बेहतर दाम मिलने और इस बार की अच्छी नमी तथा बढ़े हुए एमएसपी को देखते हुए बुवाई में तेजी जारी है।
अगले वर्ष कटाई के दौरान गेहूं की कीमतों पर दबाव और बढ़ सकता है। वर्तमान में व्यापारी, स्टॉकिस्ट और आटा-मैदा मिलें ब्याज और भाड़े की उच्च लागत से जूझ रहे हैं, जबकि गेहूं की कीमतें सीजन के निचले स्तर पर बनी हुई हैं।

निर्यात नीति पर उद्योग की नजर
गेहूं उद्योग पिछले कई महीनों से गेहूं उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध हटाने की उम्मीद में है, लेकिन अब तक सरकार की ओर से कोई अधिसूचना जारी नहीं हुई है। फिलहाल केवल चोकर के निर्यात की अनुमति दी गई है, जो उद्योग की मौजूदा परेशानी को पर्याप्त रूप से हल नहीं कर पा रही। उद्योग जगत का कहना है कि गेहूं क्षेत्र अन्य कृषि उद्योगों की तुलना में सरकारी नीतियों का सबसे अनुशासित पालन करता है।

नीतिगत सुधारों की जरूरत
एमएसपी से नीचे कीमतें टिके रहने पर अगले वर्ष फसल आवक के समय किसानों को 200–300 रुपये प्रति क्विंटल की और गिरावट देखने को मिल सकती है। इससे किसानों में निराशा बढ़ सकती है, जबकि सरकारी खरीद का आंकड़ा 50–70 लाख टन तक बढ़ने की संभावना है।
सरकारी खरीद शुरू होने से पहले ही नीतिगत सुधार किए जाएं, ताकि किसानों को कम से कम एमएसपी के बराबर मूल्य बाजार से मिल सके और उद्योग को भी स्थिर आपूर्ति और मूल्य का लाभ मिल सके।